ग़ज़ल

कबीर संग्रह 21-30

کبیر سنگرہ 21-30
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के ये दोहे मनुष्य जीवन की दुर्लभता और क्षणभंगुरता पर प्रकाश डालते हैं, यह सिखाते हैं कि मृत्यु निश्चित है और हमें वर्तमान का सदुपयोग करना चाहिए। साथ ही, वे आत्म-सम्मान का महत्व बताते हुए भीख मांगने को मृत्यु के समान मानते हैं।

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लिपि व अर्थ
1
दुर्लभ मानुष जन्म है , देह न बारम्बार। तरुवर ज्यों पत्ती झड़े , बहुरि न लागे डार॥
मानव जीवन बहुत दुर्लभ है और यह बार-बार प्राप्त नहीं होता। यह ऐसा है जैसे पेड़ से पत्ती गिर जाती है और फिर दोबारा नहीं लगती।
2
आय हैं सो जाएँगे , राजा रंक फकीर। एक सिंहासन चढ़ि चले , एक बँधे जात जंजीर॥
जो आएंगे वे सो जाएँगे, चाहे वे राजा हों, रंक हों, या फकीर। एक सिंहासन पर बैठेगा, और एक जंजीरों से बंध जाएगा।
3
काल करे सो आज कर , आज करे सो अब। पल में प्रलय होएगी , बहुरि करेगा कब॥
जो काम कल करना है उसे आज करो, और जो काम आज करना है उसे अभी करो। क्योंकि पल भर में प्रलय आ सकती है, फिर तुम वह काम कब करोगे।
4
माँगन मरण समान है , मति माँगो कोई भीख। माँगन से तो मरना भला , यह सतगुरु की सीख॥
माँगन से मरना भीख माँगने से बेहतर है; यह सच्चे गुरु की शिक्षा है।
5
जहाँ आपा तहाँ आपदां , जहाँ संशय तहाँ रोग। कह कबीर यह क्यों मिटे , चारों धीरज रोग॥
जहाँ आपा है, वहाँ आपदा है, और जहाँ संशय है, वहाँ रोग है। शायर कबीर कहते हैं कि ये चार रोग क्यों मिटें: धैर्य के चार रोग।
6
माया छाया एक सी , बिरला जाने कोय। भगता के पीछे लगे , सम्मुख भागे सोय॥
माया और छाया एक समान होती हैं, यह बात कोई कम जानता है। जो व्यक्ति भागता है, वह पीछे लगे और सामने भागे, दोनों तरह के कार्यों में उलझा रहता है।
7
आया था किस काम को , तु सोया चादर तान। सुरत सम्भाल ए गाफिल , अपना आप पहचान॥
तू किस काम से आया, जब चादर में सोया हुआ है। हे लापरवाह, अपनी सूरत संवार और खुद को पहचान।
8
क्या भरोसा देह का , बिनस जात छिन मांह। साँस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह॥
शरीर का क्या भरोसा, यह क्षण भर में नष्ट हो जाएगा। हर साँस के साथ ईश्वर का स्मरण करो और और कोई प्रयास मत करो।
9
गारी ही सों ऊपजे , कलह कष्ट और मींच। हारि चले सो साधु है , लागि चले सो नींच॥
गाली से ही उपजे, कलह कष्ट और मींच। हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच।
10
दुर्बल को न सताइए , जाकि मोटी हाय। बिना जीव की हाय से , लोहा भस्म हो जाय॥
कमजोर को परेशान न करें, नहीं तो उनका हल्का सा श्राप निकल सकता है। क्योंकि बिना जान के श्राप से भी लोहा भस्म हो सकता है।
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