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गारी ही सों ऊपजे , कलह कष्ट और मींच। हारि चले सो साधु है , लागि चले सो नींच॥ 30॥

He who leaves his home, suffering conflict and pain, is a saint; he who seeks attachment is lowly.

कबीर
अर्थ

गाली से ही उपजे, कलह कष्ट और मींच। हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच।

विस्तार

यह प्यारा दोहा हमें सिखाता है कि कैसे अपशब्दों या गाली-गलौज से ही झगड़े, दर्द और बड़ी-बड़ी परेशानियाँ जन्म लेती हैं। कबीर दास जी कहते हैं कि ऐसे माहौल में जो शख्स समझदारी से चुप होकर या उस विवाद से खुद को अलग कर लेता है, वही सच्चा साधु है। पर जो उस बहस में उलझता चला जाता है, उसी को नीच कहा गया है। यह हमें सिखाता है कि शांति और समझदारी ही सबसे बड़ा गुण है, और व्यर्थ के वाद-विवाद से दूर रहना ही भलाई है।

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