ग़ज़ल
कबीर 81-90
کبیر 81-90
कबीर के ये पद गहन आध्यात्मिक और नैतिक सत्यों का अन्वेषण करते हैं। वे सांसारिक इच्छाओं और ईश्वरीय स्मरण की असंगति पर प्रकाश डालते हैं, धैर्य में निहित शक्ति की वकालत करते हैं, और सबसे महत्वपूर्ण बात, विनम्रता के गुण की प्रशंसा करते हैं। कबीर कहते हैं कि विनम्रता ही सच्ची तृप्ति और सम्मान दिलाती है, जैसे पानी निचले स्तर पर ठहरता है या दूज के चाँद को सब सिर झुकाते हैं।
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1
जहाँ काम तहाँ नाम नहिं , जहाँ नाम नहिं वहाँ काम। दोनों कबहूँ नहिं मिले , रवि रजनी इक धाम॥ 84॥
जहाँ काम (इच्छा) है, वहाँ नाम (या ईश्वर) नहीं है; और जहाँ नाम है, वहाँ काम नहीं है। ये दोनों चीजें कभी भी मिल नहीं सकतीं, चाहे वह दिन हो या रात।
2
कबीरा धीरज के धरे , हाथी मन भर खाय। टूट एक के कारने , स्वान घरै घर जाय॥ 85॥
कबीरा ने धैर्य रखा और हाथी ने पेट भर खाया। एक टूटने के कारण, कुत्ता घर से घर चला गया।
3
ऊँचे पानी न टिके , नीचे ही ठहराय। नीचा हो सो भरिए पिए , ऊँचा प्यासा जाय॥ 86॥
ऊँचे पानी का ठहराव ऊँचा नहीं रह पाता, वह नीचे ही ठहर जाता है। इसलिए, जो निचले स्तर पर हैं, उन्हें पहले पानी पिला देना चाहिए, और जो ऊँचे स्तर पर हैं, उन्हें प्यासा ही रहने देना चाहिए।
4
सबते लघुताई भली , लघुता ते सब होय। जौसे दूज का चन्द्रमा , शीश नवे सब कोय॥ 87॥
सबसे छोटी और सूक्ष्म प्रकृति अच्छी है; छोटी से ही सब कुछ होता है। जिस प्रकार दूसरे का चंद्रमा होता है, वैसे ही सभी सिर नंगे होते हैं।
5
संत ही में सत बांटई , रोटी में ते टूक। कहे कबीर ता दास को , कबहूँ न आवे चूक॥ 88॥ मार्ग चलते जो गिरा , ताकों नाहि दोष। यह कबिरा बैठा रहे , तो सिर करड़े दोष॥ 89॥
संतों के पास सत्य बाँटा जाता है, और रोटी में भी टूक होती है। कबीर कहते हैं कि दास को कभी चूक नहीं होती। मार्ग में चलते हुए जो गिर जाता है, उस पर दोष नहीं है। यह कबीर बैठा है, तो दोष सिर पर है।
6
जब ही नाम ह्रदय धरयो , भयो पाप का नाश। मानो चिनगी अग्नि की , परि पुरानी घास॥ 90॥
जब नाम को हृदय में धारण किया जाता है, तो पाप का नाश हो जाता है। यह ऐसा है जैसे माचिस की अग्नि से पुरानी घास जल जाती है।
7
काया काठी काल घुन , जतन-जतन सो खाय। काया वैध ईश बस , मर्म न काहू पाय॥ 91॥
शरीर, अंग, समय और क्षय इसे सब खा जाते हैं। शरीर, हालांकि पीड़ित है, फिर भी अपने सार को बनाए रखता है; कोई भी इसके मूल को वास्तव में नहीं समझ सकता।
8
सुख सागर का शील है , कोई न पावे थाह। शब्द बिना साधु नही , द्रव्य बिना नहीं शाह॥ 92॥
सुख सागर का शील है, जिसका कोई अंदाज़ा नहीं है। साधु के लिए शब्द आवश्यक हैं, और राजा के लिए धन आवश्यक है।
9
बाहर क्या दिखलाए , अनन्तर जपिए राम। कहा काज संसार से , तुझे धनी से काम॥ 93॥
बाहर दिखावे पर ध्यान न दो, मन के भीतर राम का नाम जपते रहो। संसार के काम और धनवानों से कोई लेना-देना नहीं है।
10
फल कारण सेवा करे , करे न मन से काम। कहे कबीर सेवक नहीं , चहै चौगुना दाम॥ 94॥
फल के कारण सेवा करे, मन से नहीं। शायर कबीर कहते हैं कि सेवक की नहीं, बल्कि चौगुना धन की इच्छा होती है।
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