“Where there is desire, there is no name; where there is no name, there is desire. These two never meet, in the sun or the night.”
जहाँ काम (इच्छा) है, वहाँ नाम (या ईश्वर) नहीं है; और जहाँ नाम है, वहाँ काम नहीं है। ये दोनों चीजें कभी भी मिल नहीं सकतीं, चाहे वह दिन हो या रात।
यहाँ कबीर दास जी बहुत ख़ूबसूरती से समझाते हैं कि काम, यानी हमारी सांसारिक इच्छाएँ और 'नाम', यानी ईश्वर का स्मरण या सच्ची पहचान, एक साथ नहीं रह सकते। जहाँ मन में कामनाएँ भरी हों, वहाँ प्रभु का नाम ठहर नहीं पाता, और जहाँ नाम की रौशनी आ जाए, वहाँ इच्छाओं का अँधेरा मिट जाता है। वे कहते हैं कि ये दोनों कभी एक नहीं हो सकते, ठीक वैसे ही जैसे सूरज और रात कभी एक ही जगह पर एक साथ नहीं दिखते। यह हमें बताता है कि अपने भीतर सच्ची शांति और दिव्य प्रेम पाने के लिए हमें कामनाओं को छोड़ नाम को अपनाना होगा।
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