काया काठी काल घुन , जतन-जतन सो खाय। काया वैध ईश बस , मर्म न काहू पाय॥

“The body, the limbs, time, and decay, consume it all. The body, though afflicted, still keeps its essence; no one can truly grasp its core.”

— कबीर
अर्थ

शरीर, अंग, समय और क्षय इसे सब खा जाते हैं। शरीर, हालांकि पीड़ित है, फिर भी अपने सार को बनाए रखता है; कोई भी इसके मूल को वास्तव में नहीं समझ सकता।

विस्तार

कबीर दास जी इस दोहे में समझाते हैं कि हमारा यह शरीर, इसकी काया और बनावट, सब समय रूपी दीमक (घुन) के अधीन हैं। हम चाहे कितना भी यत्न कर लें, यह धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है, नष्ट होती जाती है। पर कबीर जी कहते हैं कि इस नश्वर शरीर के भीतर एक गहरा 'मर्म' छिपा है, एक ऐसा रहस्य जिसे समझना किसी के बस की बात नहीं। यह हमें शरीर की क्षणभंगुरता के बावजूद आत्मा की अमरता की ओर ले जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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