ग़ज़ल
प्रेम न बड़ी ऊपजै , प्रेम न हाट बिकाय। राजा-प्रजा जोहि रुचें , शीश देई ले जाय॥
प्रेम न बड़ी ऊपजै , प्रेम न हाट बिकाय। राजा-प्रजा जोहि रुचें , शीश देई ले जाय॥
कबीर के इन दोहों में प्रेम और सुमिरन के गहरे अर्थ को समझाया गया है। सच्चा प्रेम न तो खरीदा जा सकता है और न ही बेचा, यह केवल परम त्याग और निस्वार्थता की मांग करता है। इसी प्रकार, ईश्वर का स्मरण भी गहन आंतरिक ध्यान और बाहरी विकर्षणों से पूर्ण विमुखता चाहता है, जिससे जीवन के अंतिम क्षण तक अटूट संबंध बना रहे।
वीडियो · सूफ़ी
वीडियो देखें →गीत सुनें
1
प्रेम न बड़ी ऊपजै , प्रेम न हाट बिकाय। राजा-प्रजा जोहि रुचें , शीश देई ले जाय॥
प्रेम न बड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा-प्रजा जोहि रुचें, शीश देई ले जाय। इसका शाब्दिक अर्थ है कि प्रेम न तो आसानी से पाया जा सकता है और न ही बाजार में बेचा जा सकता है। यदि कोई राजा या प्रजा इसे चाहती है, तो उसे अपना सिर देकर ले जाना पड़ता है।
2
प्रेम प्याला जो पिये , शीश दक्षिणा देय। लोभी शीश न दे सके , नाम प्रेम का लेय॥
जो प्रेम का प्याला पीता है, वह अपना शीश दक्षिणा के रूप में देता है। लोभी व्यक्ति प्रेम का नाम लेकर भी अपना शीश नहीं दे सकता।
3
सुमिरन में मन लाइए , जैसे नाद कुरंग। कहैं कबीर बिसरे नहीं , प्रान तजे तेहि संग॥
सुमिरन में मन लाओ, जैसे बाँसुरी की ध्वनि में। कबीर कहते हैं, उसे मत भूलना, क्योंकि शरीर छोड़ने के बाद भी उसी के साथ रहना।
4
सुमरित सुरत जगाय कर , मुख के कछु न बोल। बाहर का पट बन्द कर , अन्दर का पट खोल॥
सुमरित सूरत को हाथों से जगाना, पर मुख से कुछ न बोलना। बाहर के पर्दे को बंद करना और अंदर के पर्दे को खोल देना।
5
छीर रूप सतनाम है , नीर रूप व्यवहार। हंस रूप कोई साधु है , सत का छाननहार॥
मीठे नाम का रूप शुद्ध है, और पानी का रूप व्यवहार। हंस रूप कोई साधु है, जो सत्य को छानकर अलग करता है।
6
ज्यों तिल मांही तेल है , ज्यों चकमक में आग। तेरा सांई तुझमें , बस जाग सके तो जाग॥
जैसे तिल में महत्ता तेल की है, और चकमक में आग की। तेरा सामी (स्वयं) तुझमें है; यदि तू जाग सके तो जाग।
7
जा करण जग ढ़ूँढ़िया , सो तो घट ही मांहि। परदा दिया भरम का , ताते सूझे नाहिं॥
जो कुछ भी जग में खोजा जाए, वह वास्तव में हृदय में ही होता है। पर भ्रम के पर्दे के कारण उसे देखा नहीं जा सकता।
8
जबही नाम हिरदे घरा , भया पाप का नाश। मानो चिंगरी आग की , परी पुरानी घास॥
जब भी नाम हृदय में प्रवेश करता है, पाप का नाश हो जाता है। यह ऐसा है जैसे आग की एक चिंगारी पुरानी घास पर पड़ जाए।
9
नहीं शीतल है चन्द्रमा , हिंम नहीं शीतल होय। कबीरा शीतल सन्त जन , नाम सनेही सोय॥
चन्द्रमा और हिम दोनों शीतल नहीं हैं। संतों के लिए नाम ही सच्ची शीतलता है।
10
आहार करे मन भावता , इंदी किए स्वाद। नाक तलक पूरन भरे , तो का कहिए प्रसाद॥
मन भोग की इच्छा करता है, स्वाद की चाह रखता है। यदि नाक सुगंध से भर जाए, तो प्रसाद (कृपा) का क्या कहना।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
