छीर रूप सतनाम है , नीर रूप व्यवहार। हंस रूप कोई साधु है , सत का छाननहार॥ 68॥
“The form of the sweet name (Satnam) is the pure form; the form of water is conduct/behavior. The form of the swan is a saint; one who filters out the truth.”
— कबीर
अर्थ
मीठे नाम का रूप शुद्ध है, और पानी का रूप व्यवहार। हंस रूप कोई साधु है, जो सत्य को छानकर अलग करता है।
विस्तार
यह दोहा हमें समझाता है कि ईश्वर का नाम (सतनाम) तो दूध की तरह शुद्ध और पवित्र है, लेकिन हमारा व्यवहार पानी के समान है जो इसे मिला सकता है। एक सच्चा संत हंस की तरह होता है, जिसमें यह पहचान होती है कि वह व्यवहार के सागर में से सत्य और असत्य को अलग-अलग छान ले। यह हमें सिखाता है कि सिर्फ कहने से नहीं, बल्कि अपने आचरण से ही हम असली सच्चाई को समझ और अपना सकते हैं।
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