ग़ज़ल
कबीर बेड़ा सार का , ऊपर लादा सार। पापी का पापी गुरु , यो बूढ़ा संसार॥
कबीर बेड़ा सार का , ऊपर लादा सार। पापी का पापी गुरु , यो बूढ़ा संसार॥
कबीर सच्चे गुरु के महत्व पर जोर देते हुए कहते हैं कि गुरु वह है जो 'गु' (अज्ञान रूपी अंधकार) को मिटाकर 'रु' (ज्ञान रूपी प्रकाश) देता है। वे चेतावनी देते हैं कि अज्ञानी गुरु अपने शिष्यों को भटकाते हैं, इसलिए शिष्य को मन को स्थिर कर आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने के लिए गुरु के गहन ज्ञान को समझना चाहिए।
गीत सुनें
1
कबीर बेड़ा सार का , ऊपर लादा सार। पापी का पापी गुरु , यो बूढ़ा संसार॥
कबीर के बेड़े का सार, ऊपर लाद दिया गया। पापी का पापी ही रहता है, हे यह पुराना संसार।
2
जो गुरु को तो गम नहीं , पाहन दिया बताय। शिष शोधे बिन सेइया , पार न पहुँचा जाए॥
जो व्यक्ति गुरु और भगवान का ज्ञान नहीं रखता, वह जीवन के सागर को पार नहीं कर सकता।
3
सोचे गुरु के पक्ष में , मन को दे ठहराय। चंचल से निश्चल भया , नहिं आवै नहीं जाय॥
गुरु के पक्ष में विचार करने से मन स्थिर हो गया। चंचल मन निश्चल हो गया, जो आता है और जाता है, वह अब नहीं होता।
4
गु अँधियारी जानिये , रु कहिये परकाश। मिटि अज्ञाने ज्ञान दे , गुरु नाम है तास॥
हे अंधियारी जानिये, मैं पुकारता हूँ प्रकाश। मिटा अज्ञान और दे ज्ञान; यही गुरु का नाम है।
5
गुरु नाम है गम्य का , शीष सीख ले सोय। बिनु पद बिनु मरजाद नर , गुरु शीष नहिं कोय॥
गुरु का नाम ही अंतिम गंतव्य है; हे साधक, इसे उनसे सीख लो। ऐसा व्यक्ति जिसका कोई पद या सम्मान नहीं है, वास्तव में उसका कोई गुरु नहीं होता।
6
गुरुवा तो घर फिरे , दीक्षा हमारी लेह। कै बूड़ौ कै ऊबरो , टका परदानी देह॥
गुरुवा तो घर फिरे, दीक्षा हमारी लेह। कै बूड़ौ कै ऊबरो, टका परदानी देह॥ इसका शाब्दिक अर्थ है कि हमारी दीक्षा गुरुवा के घर भटक गई है। चाहे बूढ़ी औरत दे या जवान औरत, एक छोटे से सिक्के के लिए क्या भेंट दी जाएगी।
7
गुरुवा तो सस्ता भया , कौड़ी अर्थ पचास। अपने तन की सुधि नहीं , शिष्य करन की आस॥
गुरु का महत्व बहुत कम हो गया है, जिसकी कीमत केवल पचास कौड़ियाँ है। आप अपने शरीर का ध्यान नहीं रखते, बल्कि केवल शिष्य बनने की इच्छा रखते हैं।
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