“Having thought of the Guru's side, the mind was fixed and settled. The restless became tranquil, neither coming nor going.”
गुरु के पक्ष में विचार करने से मन स्थिर हो गया। चंचल मन निश्चल हो गया, जो आता है और जाता है, वह अब नहीं होता।
कबीर दास जी यहां समझाते हैं कि जब हम अपने चंचल मन को गुरु के दिखाए रास्ते पर स्थिर कर लेते हैं, तो यह अद्भुत रूप से शांत हो जाता है। यह स्थिरता ऐसी गहरी होती है कि मन की भटकन पूरी तरह थम जाती है, जैसे वह अब कहीं आता-जाता ही न हो। गुरु की शरण में आने से, हमारा मन बेचैनी से मुक्त होकर एक ऐसी अविचल शांति में लीन हो जाता है जो हर बंधन से परे है।
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