“The word 'Guruva' (master) is cheap, worth fifty coins. You do not consider your own body, but rather the desire to become a student.”
गुरु का महत्व बहुत कम हो गया है, जिसकी कीमत केवल पचास कौड़ियाँ है। आप अपने शरीर का ध्यान नहीं रखते, बल्कि केवल शिष्य बनने की इच्छा रखते हैं।
कबीर दास जी यहाँ बड़ी ख़ूबसूरती से उन लोगों पर कटाक्ष कर रहे हैं जो बिना अपनी असलियत जाने गुरु की तलाश में भटकते हैं। वे कहते हैं कि आज गुरु तो जैसे बहुत सस्ते हो गए हैं, महज़ पचास कौड़ियों के बराबर, लेकिन लोग अपनी सुध-बुध भूलकर बस शिष्य बनने की चाह रखते हैं। यह दोहा हमें याद दिलाता है कि असली ज्ञान या यात्रा बाहर किसी गुरु को ढूंढने से पहले, अपने भीतर झाँकने और स्वयं को समझने से शुरू होती है।
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