ग़ज़ल
माया तो ठगनी बनी , ठगत फिरे सब देश। जा ठग ने ठगनी ठगो , ता ठग को आदेश॥
माया तो ठगनी बनी , ठगत फिरे सब देश। जा ठग ने ठगनी ठगो , ता ठग को आदेश॥
कबीर के ये दोहे माया की ठगिनी प्रवृत्ति का वर्णन करते हैं, जो सभी को भ्रमित करती है। वे सच्चे भजन और साधुओं के संगति के महत्व को उजागर करते हैं, यह बताते हुए कि केवल तीर्थयात्रा या शारीरिक उपस्थिति से मोक्ष नहीं मिलता, बल्कि मन की शुद्धता और सच्ची भक्ति ही आवश्यक है।
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1
माया तो ठगनी बनी , ठगत फिरे सब देश। जा ठग ने ठगनी ठगो , ता ठग को आदेश॥
माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश। जा ठग ने ठगनी ठगो, ता ठग को आदेश। (अर्थात्, माया ने एक धोखेबाज स्त्री का रूप ले लिया है और वह सभी देशों को धोखा दे रही है। जो भी इस धोखेबाज स्त्री को धोखा देने का प्रयास करेगा, उसे भी धोखेबाज़ (माया) द्वारा धोखा दिया जाएगा।)
2
भज दीना कहूँ और ही , तन साधुन के संग। कहैं कबीर कारी गजी , कैसे लागे रंग॥
मैं दीना का भजन करता हूँ, पर किसी और का; मैं शरीर की संगति में बात करता हूँ। शायर कबीर कहते हैं, 'हे चित्रकार, तुम्हें कौन सा रंग लगता है?'
3
माया छाया एक सी , बिरला जाने कोय। भागत के पीछे लगे , सन्मुख भागे सोय॥
माया और छाया एक जैसी लगती हैं, यह बात बहुत कम लोग जानते हैं। जो व्यक्ति किसी भ्रम का पीछा करता है, वह वास्तव में सामने की सच्चाई की ओर भागता है।
4
मथुरा भावै द्वारिका , भावे जो जगन्नाथ। साधु संग हरि भजन बिनु , कछु न आवे हाथ॥
मथुरा द्वारिका को अपनाता है, और द्वारिका जगन्नाथ को। साधु के साथ हरि का भजन किए बिना, हाथ में कुछ नहीं आता।
5
माली आवत देख के , कलियान करी पुकार। फूल-फूल चुन लिए , काल हमारी बार॥
माली को आते देख, कलियान ने पुकार लगाई। फूल-फूल चुनते हुए, काल ने हमारा समय लिया।
6
मैं रोऊँ सब जगत् को , मोको रोवे न कोय। मोको रोवे सोचना , जो शब्द बोय की होय॥
यदि मैं रोऊँ तो संसार में कोई नहीं रोएगा, और मैं जो कुछ भी सोचूँ या शब्द बोलूँ, उस पर भी कोई नहीं रोएगा।
7
ये तो घर है प्रेम का , खाला का घर नाहिं। सीस उतारे भुँई धरे , तब बैठें घर माहिं॥
यह प्रेम का घर है, खाला का नहीं। जब सिर उतारकर (यानी, सम्मानपूर्वक) घर में बैठेंगे।
8
या दुनियाँ में आ कर , छाँड़ि देय तू ऐंठ। लेना हो सो लेइले , उठी जात है पैंठ॥
इस दुनिया में आकर, तू यह अहंकार छोड़ दे। जो लेना है, ले ले; यह झूठा गर्व अब चला जाता है।
9
राम नाम चीन्हा नहीं , कीना पिंजर बास। नैन न आवे नीदरौं , अलग न आवे भास॥
राम नाम को किसी चिन्ह से नहीं, न ही किसी पिंजरे में बसना है। मेरी आँखें नींद से नहीं आतीं, और मेरा मन भी शांति से नहीं आता।
10
रात गंवाई सोय के , दिवस गंवाया खाय। हीरा जन्म अनमोल था , कौंड़ी बदले जाए॥
रात को नींद में और दिन में खाना बर्बाद करना। हीरा जन्म से अनमोल होता है, जिसे कौड़ी से नहीं बदला जा सकता।
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