“If I weep, no one in the world weeps for me; no one weeps at my thoughts, whatever words I utter.”
यदि मैं रोऊँ तो संसार में कोई नहीं रोएगा, और मैं जो कुछ भी सोचूँ या शब्द बोलूँ, उस पर भी कोई नहीं रोएगा।
कबीर दास जी यहाँ कितनी मार्मिक बात कह रहे हैं कि वो तो सारे संसार के दुखों पर रोते हैं, पर जब उन्हें ज़रूरत होती है, तो उनके लिए कोई नहीं रोता। पर फिर वो कहते हैं कि असल में उनके लिए कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि उनके गहरे विचार और वो शब्द रोते हैं, जो वो बीज की तरह बोते हैं। ये शब्द ही तो उनकी विरासत हैं, जो समय के साथ फलते-फूलते हैं और लोगों के दिलों में जगह बनाते हैं। यह एक तरह से उनके अमर संदेश हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी गूंजते रहते हैं।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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