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ग़ज़ल

कबीर 21-30

کبیر 21-30
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के ये पद मानव जीवन की क्षणभंगुरता और महत्ता पर बल देते हैं, और शीघ्र कार्य करने का आग्रह करते हैं क्योंकि मृत्यु किसी को नहीं छोड़ती। वे टालमटोल न करने की सलाह देते हुए वर्तमान क्षण के महत्व पर जोर देते हैं। इसके अतिरिक्त, कबीर आत्म-सम्मान का पाठ पढ़ाते हैं, यह बताते हुए कि भीख माँगना मृत्यु के समान है।

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1
दुर्लभ मानुष जन्म है , देह न बारम्बार। तरुवर ज्यों पत्ती झड़े , बहुरि न लागे डार॥ 22॥
मानव जन्म दुर्लभ होता है और यह देह बार-बार प्राप्त नहीं होती। जैसे पेड़ से पत्ती झड़ जाती है, वैसे ही यह जीवन एक बार ही मिलता है।
2
आय हैं सो जाएँगे , राजा रंक फकीर। एक सिंहासन चढ़ि चले , एक बँधे जात जंजीर॥ 23॥
आए हुए लोग सो जाएँगे, चाहे वे राजा हों, रंक हों या फकीर। एक व्यक्ति सिंहासन पर चढ़ेगा, और दूसरा जंजीरों से बंध जाएगा।
3
काल करे सो आज कर , आज करे सो अब। पल में प्रलय होएगी , बहुरि करेगा कब॥ 24॥
कल का कार्य आज करो और आज का कार्य अभी करो। क्योंकि पल भर में प्रलय आ जाएगी, तब तुम यह कार्य कब करोगे।
4
माँगन मरण समान है , मति माँगो कोई भीख। माँगन से तो मरना भला , यह सतगुरु की सीख॥ 25॥
माँगन (मांगना) और मरण (मृत्यु) समान हैं, और कोई भीख माँगो। माँगने से तो मरना ही भला है, यह सच्चे गुरु की सीख है।
5
जहाँ आपा तहाँ आपदां , जहाँ संशय तहाँ रोग। कह कबीर यह क्यों मिटे , चारों धीरज रोग॥ 26॥
जहाँ आपा होता है, वहाँ आपदा आती है; जहाँ संशय होता है, वहाँ रोग होता है। शायर कबीर कहते हैं कि ये चारों रोग—आपा, संशय, और धीरज का रोग—क्यों मिटे?
6
माया छाया एक सी , बिरला जाने कोय। भगता के पीछे लगे , सम्मुख भागे सोय॥ 27॥
माया और छाया एक समान हैं, और यह बात बहुत कम लोगों को पता है। एक व्यक्ति भक्ति के मार्ग पर चलता है, जबकि दूसरा उससे दूर भागता है।
7
आया था किस काम को , तु सोया चादर तान। सुरत सम्भाल ए गाफिल , अपना आप पहचान॥ 28॥
तू किस काम से आया, चादर ओढ़कर सो गया। हे लापरवाह, अपनी सुंदरता को संभाल और स्वयं को पहचान।
8
क्या भरोसा देह का , बिनस जात छिन मांह। साँस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह॥ 29॥
शरीर का क्या भरोसा, यह पल भर में नष्ट हो जाएगा। हर साँस के साथ सुमिरन करना और कोई प्रयास नहीं करना चाहिए।
9
गारी ही सों ऊपजे , कलह कष्ट और मींच। हारि चले सो साधु है , लागि चले सो नींच॥ 30॥
गाली (अपमान) से ही कलह, कष्ट और मींच उत्पन्न होते हैं। जो व्यक्ति हारकर चला जाता है, वह सच्चा साधु है; और जो व्यक्ति लगातार भटकता रहता है, वह केवल नीच है।
10
दुर्बल को न सताइए , जाकि मोटी हाय। बिना जीव की हाय से , लोहा भस्म हो जाय॥ 31॥
कमजोरों को परेशान न करें, क्योंकि उनका श्राप बहुत शक्तिशाली होता है। बिना जीवन के ही उनकी आह से लोहा भस्म हो सकता है।
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