गारी ही सों ऊपजे , कलह कष्ट और मींच। हारि चले सो साधु है , लागि चले सो नींच॥

“He who leaves his home and settles, is filled with strife, distress, and misery. He who departs, is truly a saint; he who wanders, is merely lowly.”

— कबीर
अर्थ

गाली (अपमान) से ही कलह, कष्ट और मींच उत्पन्न होते हैं। जो व्यक्ति हारकर चला जाता है, वह सच्चा साधु है; और जो व्यक्ति लगातार भटकता रहता है, वह केवल नीच है।

विस्तार

कबीर यहाँ जीवन के सफर की एक बड़ी प्यारी बात समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि जब हम किसी एक जगह या चीज़ से बहुत जुड़ जाते हैं, तो उसी लगाव से झगड़े, दुख और परेशानी पैदा होती है। सच्चा साधु वो है जो इन मोह-माया के बंधनों को छोड़कर आगे बढ़ता रहता है, जो किसी भी चीज़ में अटकता नहीं। इसके उलट, जो इन सांसारिक चीज़ों में फँसकर रह जाता है, उसे कबीर आध्यात्मिक रूप से नीच यानी कमजोर मानते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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