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ग़ज़ल

कबीर 171-180

کبیر 171-180
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के ये दोहे जीवन और संसार की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डालते हैं, जहाँ सांसारिक पद अस्थायी हैं। कबीर नैतिक जीवन की वकालत करते हुए कहते हैं कि दूसरों को ठगने के बजाय स्वयं ठगा जाना स्वीकार करें, क्योंकि इसमें आंतरिक सुख है। वे जोर देते हैं कि कथा और कीर्तन जैसे आध्यात्मिक अभ्यास भवसागर पार करने का एकमात्र सच्चा मार्ग हैं, और सलाह देते हैं कि नश्वर मानव देह का उपयोग संतों की सेवा या ईश्वर भक्ति के लिए किया जाना चाहिए।

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1
कबीर यह जग कुछ नहीं , खिन खारा मीठकाल्ह जो बैठा भण्डपै , आज भसाने दीठ174
कबीर कहते हैं कि यह संसार न तो कड़वा है और न ही मीठा। कल जो व्यक्ति भंडार में बैठा था, आज उसे बाहर फेंक दिया गया है।
2
कबिरा आप ठगाइए , और ठगिए कोयआप ठगे सुख होत है , और ठगे दुख होय175
कबीरा, आप हमारा छल कीजिए, और किसी और को छल मत करना। आपको छल करने से सुख होता है, और दूसरों को छल करने से दुख होता है।
3
कथा कीर्तन कुल विशे , भव सागर की नावकहत कबीरा या जगत , नाहीं और उपाय176
कथा और कीर्तन ही कुल विशेष हैं, जो भवसागर की नाव हैं। कबीर कहते हैं कि इस जगत में कोई और उपाय नहीं है।
4
कबिरा यह तन जात है , सके तो ठौर लगाकै सेवा कर साधु की , कै गोविंद गुनगा177
कबिरा, यह शरीर नाशवान है, यदि आप इसके लिए कोई जगह खोज सकें। साधु की सेवा में या गोविंद के गुणगान में क्या सेवा की जा सकती है।
5
कलि खोटा सजग आंधरा , शब्द माने कोयचाहे कहूँ सत आइना , सो जग बैरी होय178
कलि, जो कि झूठी, सचेत और अंधकारमय है, किसी शब्द का पालन नहीं करती। यदि मैं सत्य का आईना दिखाऊँ, तो पूरी दुनिया शत्रु बन जाती है।
6
केतन दिन ऐसे गए , अन रुचे का नेहअवसर बोवे उपजे नहीं , जो नहिं बरसे मेह179
केतन दिन ऐसे बीत गए, अनियंत्रित प्रेम के साथ। अवसर उन लोगों के लिए नहीं उगते जिन्हें बारिश नहीं होती।
7
कबीर जात पुकारया , चढ़ चन्दन की डारवाट लगाए ना लगे फिर क्या लेत हमार180
कबीर ने जाति का पुकार किया और चंदन के मार्ग पर चढ़ गए। यदि हम रास्तों से विमुख हैं, तो और क्या ले सकते हैं।
8
कबीरा खालिक जागिया , और ना जागे कोयजाके विषय विष भरा , दास बन्दगी होय181
कबीरा, खालिक जाग गए, और न जागा कोई। जिसके विषय विष भरा, दास बन्दगी होय। इसका अर्थ है कि ईश्वर (खालिक) जाग्रत हैं, लेकिन कोई व्यक्ति नहीं जागा है। जो लोग विषैले विषयों में लगे रहते हैं, वे केवल दास और बंधगी बनकर रह जाते हैं।
9
गाँठि थामहिं बाँध ही , नहिं नारी सो नेहकह कबीर वा साधु की , हम चरनन की खेह182
कबीर कहते हैं कि न तो कोई गाँठ बांधे जा सकता है और न ही स्त्री का प्रेम। वे कहते हैं कि हम तो आपके चरणों की नदी में हैं।
10
खेत छोड़े सूरमा , जूझे को दल माँहआशा जीवन मरण की , मन में राखे नाँह183
वीर योद्धा खेत नहीं छोड़ता; वह जीवन और मृत्यु की आशा अपने मन में रखता है।
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