ग़ज़ल

कबीर यह जग कुछ नहीं , खिन खारा मीठ। काल्ह जो बैठा भण्डपै , आज भसाने दीठ॥

कबीर यह जग कुछ नहीं , खिन खारा मीठ। काल्ह जो बैठा भण्डपै , आज भसाने दीठ॥
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के ये दोहे जीवन और संसार की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डालते हैं, जहाँ सांसारिक पद अस्थायी हैं। कबीर नैतिक जीवन की वकालत करते हुए कहते हैं कि दूसरों को ठगने के बजाय स्वयं ठगा जाना स्वीकार करें, क्योंकि इसमें आंतरिक सुख है। वे जोर देते हैं कि कथा और कीर्तन जैसे आध्यात्मिक अभ्यास भवसागर पार करने का एकमात्र सच्चा मार्ग हैं, और सलाह देते हैं कि नश्वर मानव देह का उपयोग संतों की सेवा या ईश्वर भक्ति के लिए किया जाना चाहिए।

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
कबीर यह जग कुछ नहीं , खिन खारा मीठ। काल्ह जो बैठा भण्डपै , आज भसाने दीठ॥
कबीर कहते हैं कि यह संसार न तो कड़वा है और न ही मीठा। कल जो व्यक्ति भंडार में बैठा था, आज उसे बाहर फेंक दिया गया है।
2
कबिरा आप ठगाइए , और न ठगिए कोय। आप ठगे सुख होत है , और ठगे दुख होय॥
कबीरा, आप हमारा छल कीजिए, और किसी और को छल मत करना। आपको छल करने से सुख होता है, और दूसरों को छल करने से दुख होता है।
3
कथा कीर्तन कुल विशे , भव सागर की नाव। कहत कबीरा या जगत , नाहीं और उपाय॥
कथा और कीर्तन ही कुल विशेष हैं, जो भवसागर की नाव हैं। कबीर कहते हैं कि इस जगत में कोई और उपाय नहीं है।
4
कबिरा यह तन जात है , सके तो ठौर लगा। कै सेवा कर साधु की , कै गोविंद गुनगा॥
कबिरा, यह शरीर नाशवान है, यदि आप इसके लिए कोई जगह खोज सकें। साधु की सेवा में या गोविंद के गुणगान में क्या सेवा की जा सकती है।
5
कलि खोटा सजग आंधरा , शब्द न माने कोय। चाहे कहूँ सत आइना , सो जग बैरी होय॥
कलि, जो कि झूठी, सचेत और अंधकारमय है, किसी शब्द का पालन नहीं करती। यदि मैं सत्य का आईना दिखाऊँ, तो पूरी दुनिया शत्रु बन जाती है।
6
केतन दिन ऐसे गए , अन रुचे का नेह। अवसर बोवे उपजे नहीं , जो नहिं बरसे मेह॥
केतन दिन ऐसे बीत गए, अनियंत्रित प्रेम के साथ। अवसर उन लोगों के लिए नहीं उगते जिन्हें बारिश नहीं होती।
7
कबीर जात पुकारया , चढ़ चन्दन की डार। वाट लगाए ना लगे फिर क्या लेत हमार॥
कबीर ने जाति का पुकार किया और चंदन के मार्ग पर चढ़ गए। यदि हम रास्तों से विमुख हैं, तो और क्या ले सकते हैं।
8
कबीरा खालिक जागिया , और ना जागे कोय। जाके विषय विष भरा , दास बन्दगी होय॥
कबीरा, खालिक जाग गए, और न जागा कोई। जिसके विषय विष भरा, दास बन्दगी होय। इसका अर्थ है कि ईश्वर (खालिक) जाग्रत हैं, लेकिन कोई व्यक्ति नहीं जागा है। जो लोग विषैले विषयों में लगे रहते हैं, वे केवल दास और बंधगी बनकर रह जाते हैं।
9
गाँठि न थामहिं बाँध ही , नहिं नारी सो नेह। कह कबीर वा साधु की , हम चरनन की खेह॥
कबीर कहते हैं कि न तो कोई गाँठ बांधे जा सकता है और न ही स्त्री का प्रेम। वे कहते हैं कि हम तो आपके चरणों की नदी में हैं।
10
खेत न छोड़े सूरमा , जूझे को दल माँह। आशा जीवन मरण की , मन में राखे नाँह॥
वीर योद्धा खेत नहीं छोड़ता; वह जीवन और मृत्यु की आशा अपने मन में रखता है।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

कबीर यह जग कुछ नहीं , खिन खारा मीठ। काल्ह जो बैठा भण्डपै , आज भसाने दीठ॥ | Sukhan AI