ग़ज़ल

तुझी से इब्तिदा है तू ही इक दिन इंतिहा होगा

تجھی سے ابتدا ہے تو ہی اک دن انتہا ہوگا
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 11 shers· radif: होगा

यह ग़ज़ल ईश्वरीय सत्ता के शाश्वत स्वरूप को व्यक्त करती है, जिसमें ईश्वर को ही समस्त सृष्टि का आरंभ और अंत माना गया है। कवि इसमें सूफ़ी भक्ति और अटूट विश्वास को दर्शाते हुए महशर के रोज़ भी अपने प्रियतम के साथ एक अत्यंत आत्मीय और विशेष संबंध की सुंदर अभिव्यक्ति करता है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
तुझी से इब्तिदा है तू ही इक दिन इंतिहा होगा सदा-ए-साज़ होगी और न साज़-ए-बे-सदा होगा
सब कुछ तुझ ही से शुरू है और एक दिन तुझ ही पर समाप्त होगा; उस समय न तो साज़ की आवाज़ बचेगी और न ही कोई खामोश साज़ रहेगा।
2
हमें मालूम है हम से सुनो महशर में क्या होगा सब उस को देखते होंगे वो हम को देखता होगा
हमें पता है, हमसे सुनो कि क़यामत के दिन क्या होगा; उस दिन सारी दुनिया उसे देख रही होगी और वह हमें देख रहा होगा।
3
सर-ए-महशर हम ऐसे आसियों का और क्या होगा दर-ए-जन्नत न वा होगा दर-ए-रहमत तो वा होगा
क़यामत के दिन हम जैसे गुनहगारों का और क्या अंजाम होगा? अगर जन्नत का दरवाज़ा नहीं भी खुला, तो रहमत का दरवाज़ा तो ज़रूर खुलेगा।
4
जहन्नम हो कि जन्नत जो भी होगा फ़ैसला होगा ये क्या कम है हमारा और उन का सामना होगा
फ़ैसला चाहे नर्क का हो या स्वर्ग का, जो भी तय होगा देखा जाएगा; क्या यह कोई छोटी बात है कि कम से कम हमारा और उनका आमना-सामना तो होगा।
5
अज़ल हो या अबद दोनों असीर-ए-ज़ुल्फ़-ए-हज़रत हैं जिधर नज़रें उठाओगे यही इक सिलसिला होगा
चाहे अनादि काल हो या अनंत काल, दोनों ही महबूब की ज़ुल्फ़ों के कैदी हैं; आप जिधर भी नज़र उठाएंगे, बस यही एक सिलसिला दिखाई देगा।
6
ये निस्बत इश्क़ की बे-रंग लाए रह नहीं सकती जो महबूब-ए-ख़ुदा का है वो महबूब-ए-ख़ुदा होगा
इश्क़ का यह संबंध अपना असर और रंग दिखाए बिना नहीं रह सकता; जो ख़ुदा के महबूब का प्यारा है, वह निश्चित ही ख़ुदा का भी महबूब बन जाएगा।
7
इसी उम्मीद पर हम तालिबान-ए-दर्द जीते हैं ख़ोशा दर्द दे कि तेरा और दर्द-ए-ला-दवा होगा
हम दर्द के तलबगार इसी उम्मीद पर जीते हैं कि आपका दिया हुआ दर्द कितना सुखद होगा, क्योंकि वह आपका दिया हुआ होगा और उसका कोई इलाज नहीं होगा।
8
निगाह-ए-क़हर पर भी जान-ओ-दिल सब खोए बैठा है निगाह-ए-मेहर आशिक़ पर अगर होगी तो क्या होगा
जब आशिक़ महबूब की ग़ुस्से भरी नज़र पर ही अपना दिल और जान सब कुछ लुटा बैठा है, तो अगर उस पर प्यार और मेहरबानी की नज़र पड़ गई तो उसका क्या हाल होगा।
9
सियाना भेज देगा हम को महशर से जहन्नम में मगर जो दिल पे गुज़रेगी वो दिल ही जानता होगा
कोई समझदार हमें क़यामत के मैदान से नरक में भेज तो देगा, लेकिन उस वक्त दिल पर जो बीतेगी उसे केवल दिल ही जानता होगा।
10
समझता क्या है तू दीवानगान-ए-इश्क़ को ज़ाहिद ये हो जाएँगे जिस जानिब उसी जानिब ख़ुदा होगा
ऐ ज़ाहिद, तू इश्क़ के दीवानों को क्या समझता है? ये जिस तरफ़ भी रुख़ करेंगे, ख़ुदा उसी तरफ़ होगा।
11
'जिगर' का हाथ होगा हश्र में और दामन-ए-हज़रत शिकायत हो कि शिकवा जो भी होगा बरमला होगा
प्रलय (हश्र) के दिन जिगर का हाथ हज़रत (पैग़ंबर) के दामन में होगा; चाहे कोई शिकायत हो या शिकवा, जो कुछ भी होगा वह सबके सामने खुलकर कहा जाएगा।
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