ग़ज़ल
वही मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी
वही मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी
यह ग़ज़ल नियति के विरोधाभासों और मानवीय रिश्तों की जटिलता को दर्शाती है। कवि अपनी कम-नसीबी को एक अनजाने 'कमाल-ए-नै-नवाज़ी' से जोड़ते हुए जीवन के उस द्वंद्व को व्यक्त करता है, जहाँ जगह और अस्तित्व का कोई निश्चित ठिकाना नहीं है। यह प्रेम, धोखा और नियति के जाल में फँसे मानवीय अनुभवों का गहन चिंतन है।
गीत सुनें
1
वही मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी
मिरे काम कुछ न आया ये कमाल-ए-नै-नवाज़ी
वही मेरी कम-नसीबी है, वही तेरी बे-नियाज़ी; मेरे काम कुछ न आया, ये कमाल-ए-नै-नवाज़ी।
2
मैं कहाँ हूँ तू कहाँ है ये मकाँ कि ला-मकाँ है
ये जहाँ मिरा जहाँ है कि तिरी करिश्मा-साज़ी
मैं कहाँ हूँ और तू कहाँ है? क्या यह मकान है या नहीं? क्या यह संसार मेरा है या तेरी कृपा से बना है?
3
इसी कश्मकश में गुज़रीं मिरी ज़िंदगी की रातें
कभी सोज़-ओ-साज़-ए-'रूमी' कभी पेच-ओ-ताब-ए-'राज़ी'
इस उलझन में मेरी ज़िंदगी की रातें गुज़रीं, कभी 'रूमी' का जलता जुनून, तो कभी 'राज़ी' का जटिल आकर्षण।
4
वो फ़रेब-ख़ुर्दा शाहीं कि पला हो करगसों में
उसे क्या ख़बर कि क्या है रह-ओ-रस्म-ए-शाहबाज़ी
वह धोखेबाज़ शाही अंदाज़ जो दिल की गहराइयों में छिपा है, उसे क्या पता कि सच्ची महानता के रीति-रिवाज और नियम क्या हैं।
5
न ज़बाँ कोई ग़ज़ल की न ज़बाँ से बा-ख़बर मैं
कोई दिल-कुशा सदा हो अजमी हो या कि ताज़ी
यह न तो ग़ज़ल की ज़बान है, न ही यह ज़बान से वाकिफ़ है। चाहे यह अजमी की मधुर आवाज़ हो या कोई ताज़ा, नई ध्वनि।
6
नहीं फ़क़्र ओ सल्तनत में कोई इम्तियाज़ ऐसा
ये सिपह की तेग़-बाज़ी वो निगह की तेग़-बाज़ी
फ़क़्र और सल्तनत में कोई भेद नहीं है; यह सिपाही की तलवारबाज़ी है और निगाह की तलवारबाज़ी।
7
कोई कारवाँ से टूटा कोई बद-गुमाँ हरम से
कि अमीर-ए-कारवाँ में नहीं ख़ू-ए-दिल-नवाज़ी
कोई कारवाँ से टूटा, कोई बद-गुमाँ हरम से; कि अमीर-ए-कारवाँ में नहीं ख़ू-ए-दिल-नवाज़ी।
(अर्थात: कुछ कारवाँ टूट गए हैं, कुछ भ्रम के महल से; क्योंकि कारवाँ का अमीर दिल को मोह लेने वाली नज़ाकत नहीं रखता।)
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