न ज़बाँ कोई ग़ज़ल की न ज़बाँ से बा-ख़बर मैं कोई दिल-कुशा सदा हो अजमी हो या कि ताज़ी

“Neither the tongue is a ghazal's tongue, nor is it aware from the tongue, Whether it be Azmi's sweet voice, or a fresh, new sound.”

— अल्लामा इक़बाल
अर्थ

यह न तो ग़ज़ल की ज़बान है, न ही यह ज़बान से वाकिफ़ है। चाहे यह अजमी की मधुर आवाज़ हो या कोई ताज़ा, नई ध्वनि।

विस्तार

यह शेर बताता है कि वक्ता के एहसास इतने गहरे हैं कि वे शायरी की रीतियों और भाषा में समा नहीं पाते। शायर कहते हैं कि उनकी ज़ुबान ग़ज़ल की भाषा से बेख़बर है। इसका मतलब है कि दिल का सच... शब्दों की सीमा से परे है, और यह सच्चाई किसी भी आवाज़ से कहीं ज़्यादा शक्तिशाली है।

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पाठ
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