ग़ज़ल

सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं

सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं

यह ग़ज़ल एक आत्म-जागरूक और विद्रोही स्वर लिए हुए है, जिसमें शायर अपने दिल पर किए गए कठोर व्यवहार को स्वीकार करता है, लेकिन साथ ही यह भी दावा करता है कि वह बाहरी दुनिया से बेखबर है। वह अपने अस्तित्व को भ्रम और सत्य के बीच झूलते हुए दिखाता है, और अपनी ही कमियों को अपनी महानता का प्रमाण मानता है।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं हाए क्या अच्छी कही ज़ालिम हूँ मैं जाहिल हूँ मैं
मैं अपने दिल पर कठिनाइयाँ सहता हूँ, और दूसरों की उपस्थिति से अनजान हूँ। आह, आपने कितनी अच्छी बात कही! मैं क्रूर हूँ, मैं अज्ञानी हूँ।
2
मैं जभी तक था कि तेरी जल्वा-पैराई न थी जो नुमूद-ए-हक़ से मिट जाता है वो बातिल हूँ मैं
जब तक मुझे तुम्हारा दिव्य तेज नहीं मिला, मैं अनजान था; मैं वह भ्रम हूँ जो सत्य से मिट जाता है।
3
इल्म के दरिया से निकले ग़ोता-ज़न गौहर-ब-दस्त वाए महरूमी ख़ज़फ़ चैन लब साहिल हूँ मैं
इल्म की नदी से निकले गोताखोर-गहनों के खज़ाने, मैं वह किनारा हूँ जिसका चैन अभाव की हवा से क्षरित हो गया है।
4
है मिरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं वो ग़ाफ़िल हूँ मैं
मेरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील है, और मैं वह ग़ाफ़िल हूँ जिसकी ग़फ़लत पर मलक रोते हैं।
5
बज़्म-ए-हस्ती अपनी आराइश पे तू नाज़ाँ न हो तू तो इक तस्वीर है महफ़िल की और महफ़िल हूँ मैं
हस्ती की रौनक अपनी सजावट पर तू इतना संकोच न कर, तू तो महफ़िल की बस एक तस्वीर है और मैं पूरी महफ़िल हूँ।
6
ढूँढता फिरता हूँ मैं 'इक़बाल' अपने-आप को आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं
मैं 'इक़बाल' अपने आप को ढूँढता फिरता हूँ, मानो मैं खुद ही मुसाफ़िर और मंज़िल दोनों हूँ।
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