इल्म के दरिया से निकले ग़ोता-ज़न गौहर-ब-दस्त — अल्लामा इक़बाल
“From the river of knowledge, the diving gem, O treasure of hands, I am the shore whose peace is eroded by the wind of deprivation.”
अर्थ
इल्म की नदी से निकले गोताखोर-गहनों के खज़ाने, मैं वह किनारा हूँ जिसका चैन अभाव की हवा से क्षरित हो गया है।
विस्तार
यह शेर ज्ञान और एहसास के बीच के गहरे विरोधाभास को दर्शाता है। शायर कहते हैं कि मैं ज्ञान की नदी से निकले एक अनमोल रत्न जैसा हूँ। लेकिन दूसरी पंक्ति में एक बेचैनी है—मैं तो किनारा हूँ, पर मेरा सुकून भी बिछड़ने से खो गया है। इसका मतलब है कि ज्ञान कितना भी बड़ा क्यों न हो, दिल की उदासी और दूरी का दर्द उससे ऊपर होता है।
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