बज़्म-ए-हस्ती अपनी आराइश पे तू नाज़ाँ न हो — अल्लामा इक़बाल

बज़्म-ए-हस्ती अपनी आराइश पे तू नाज़ाँ न हो तू तो इक तस्वीर है महफ़िल की और महफ़िल हूँ मैं

“In the splendor of existence, do not be so coy with your adornments, You are merely a picture in the gathering, and I am the gathering.”

— अल्लामा इक़बाल

अर्थ

हस्ती की रौनक अपनी सजावट पर तू इतना संकोच न कर, तू तो महफ़िल की बस एक तस्वीर है और मैं पूरी महफ़िल हूँ।

विस्तार

यह शेर बहुत गहरा है। शायर कह रहे हैं कि प्रिय महबूबा को अपनी खूबसूरती का दिखावा नहीं करना चाहिए, क्योंकि शायर खुद ही महफ़िल हैं। यानी, शायर की उपस्थिति, उनकी भावनाएँ और उनका वजूद इतना संपूर्ण है कि महफ़िल को सजाने के लिए किसी तस्वीर की ज़रूरत ही नहीं है। यह आत्म-सम्मान और भावनात्मक पूर्णता का इज़हार है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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