ग़ज़ल
परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए
परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए
यह ग़ज़ल एक गहरी बेचैनी और बेचैन मन की स्थिति को बयाँ करती है, जहाँ शायर को डर है कि उसका दुःख या बेचैनी कभी किसी स्थायी या असहनीय रूप में न बदल जाए। वह अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने और जीवन की वर्तमान कठिनाइयों से मुक्ति पाने की कामना करता है, लेकिन साथ ही अपनी भावनात्मक यात्रा और अनुभवों के महत्व को भी स्वीकार करता है।
गीत सुनें
1
परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए
जो मुश्किल अब है या रब फिर वही मुश्किल न बन जाए
परेशाँ होकर मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए, और जो मुश्किल अभी है, या रब, वो फिर से मुश्किल न बन जाए।
2
न कर दें मुझ को मजबूर-ए-नवाँ फ़िरदौस में हूरें
मिरा सोज़-ए-दरूँ फिर गर्मी-ए-महफ़िल न बन जाए
न कर दें मुझ को नवाँ फ़िरदौस में हूरें, वरना मेरा अंदर का जलना फिर महफ़िल की गर्मी न बन जाए।
3
कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को
खटक सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए
कभी छोड़ी हुई मंजिल भी राहगीर को याद आती है। यह दिल में एक चुभन सी है कि कहीं यह मंज़िल का ग़म न बन जाए।
4
बनाया इश्क़ ने दरिया-ए-ना-पैदा-कराँ मुझ को
ये मेरी ख़ुद-निगह-दारी मिरा साहिल न बन जाए
इश्क़ ने मुझको एक ऐसा दरिया बना दिया है जहाँ मेरा कोई जन्म नहीं हुआ; यह मेरी अपनी नज़र (या ध्यान) मेरे लिए किनारा न बन जाए।
5
कहीं इस आलम-ए-बे-रंग-ओ-बू में भी तलब मेरी
वही अफ़्साना-ए-दुंबाला-ए-महमिल न बन जाए
कहीं इस रंगहीन और गंधहीन दुनिया में भी मेरी चाहत वैसी बोझिल कहानी न बन जाए।
6
उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए
मिट्टी के मनुष्य के उत्थान से आसमान के तारे सहम जाते हैं, कि कहीं यह टूटा हुआ तारा प्रेम का पूर्ण चंद्रमा न बन जाए।
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