न कर दें मुझ को मजबूर-ए-नवाँ फ़िरदौस में हूरें — अल्लामा इक़बाल

न कर दें मुझ को मजबूर-ए-नवाँ फ़िरदौस में हूरें मिरा सोज़-ए-दरूँ फिर गर्मी-ए-महफ़िल न बन जाए

“Do not force me in the paradise of the nine, with its nymphs, Lest my inner burning turns into the heat of the gathering.”

— अल्लामा इक़बाल

अर्थ

न कर दें मुझ को नवाँ फ़िरदौस में हूरें, वरना मेरा अंदर का जलना फिर महफ़िल की गर्मी न बन जाए।

विस्तार

यह शेर जुनून और आत्म-नियंत्रण की बात करता है। शायर कह रहे हैं कि हे हूरों! आप मुझे जन्नत में मजबूर न करें.... क्योंकि मेरा अंदर का जो जोश है, मेरा सोज़-ए-दरूँ है, वो इतना तीव्र है कि अगर आपने मुझे धकेल दिया.... तो यह महफ़िल, यह माहौल, गर्मी से तप जाएगा। यह एक चेतावनी है कि भावनाएं कितनी शक्तिशाली हो सकती हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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