ग़ज़ल
न हो तुग़्यान-ए-मुश्ताक़ी तो मैं रहता नहीं बाक़ी
न हो तुग़्यान-ए-मुश्ताक़ी तो मैं रहता नहीं बाक़ी
यह ग़ज़ल प्रेम की गहन महत्ता को व्यक्त करती है, जिसमें शायर कहता है कि यदि वह प्रिय का उत्कट प्रेम (तुग़्यान-ए-मुश्ताक़ी) न हो, तो उसका वजूद ही नहीं है। वह बताता है कि उसकी ज़िंदगी का सार ही यह प्रेम है, और यह महफ़िल में किसी दर्द-आश्ना की उपस्थिति से जीवित है।
गीत सुनें
1
न हो तुग़्यान-ए-मुश्ताक़ी तो मैं रहता नहीं बाक़ी
कि मेरी ज़िंदगी क्या है यही तुग़्यान-ए-मुश्ताक़ी
यदि उत्कट लालसा की धारा न हो, तो मैं शेष नहीं रह सकता; क्योंकि मेरा जीवन यही उत्कट लालसा की धारा है।
2
मुझे फ़ितरत नवा पर पै-ब-पै मजबूर करती है
अभी महफ़िल में है शायद कोई दर्द-आश्ना बाक़ी
मुझे अपनी प्रकृति पर कदम-कदम मजबूर करती है, शायद इस महफ़िल में कोई दर्द-परिचित बचा है।
3
वो आतिश आज भी तेरा नशेमन फूँक सकती है
तलब सादिक़ न हो तेरी तो फिर क्या शिकवा-ए-साक़ी
वह आग आज भी तेरा नशा मन फूंक सकती है, अगर मेरा मन तेरी चाहत न हो तो फिर सेवार से क्या शिकायत?
4
न कर अफ़रंग का अंदाज़ा उस की ताबनाकी से
कि बिजली के चराग़ों से है इस जौहर की बर्राक़ी
अजनबी के आकर्षण से इस आंतरिक चमक का अंदाज़ा मत लगाना, क्योंकि इसकी चमक बिजली के लैंपों से नहीं, बल्कि स्वयं के सार से है।
5
दिलों में वलवले आफ़ाक़-गीरी के नहीं उठते
निगाहों में अगर पैदा न हो अंदाज़-ए-आफ़ाक़ी
दिल में विशाल क्षितिज के वलवले तब नहीं उठते, जब तक आँखों में क्षितिज का अंदाज़ पैदा न हो।
6
ख़िज़ाँ में भी कब आ सकता था मैं सय्याद की ज़द में
मिरी ग़म्माज़ थी शाख़-ए-नशेमन की कम औराक़ी
पतझड़ में भी कब आ सकता था मैं सयाद के ज़िद में, मेरी महफ़िल थी शाख़-ए-नशेमन की कम औराक़ी।
7
उलट जाएँगी तदबीरें बदल जाएँगी तक़दीरें
हक़ीक़त है नहीं मेरे तख़य्युल की है ख़ल्लाक़ी
तैयारियाँ उलट जाएँगी और तक़दीरें भी बदल जाएँगी, यह हकीकत नहीं है बल्कि मेरे ख़यालों की कल्पना मात्र है।
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