ख़िज़ाँ में भी कब आ सकता था मैं सय्याद की ज़द में
मिरी ग़म्माज़ थी शाख़-ए-नशेमन की कम औराक़ी
“Even in autumn, when could I have arrived, in Sayyad's stubbornness, My chamber was lacking the leaves of the garden's pleasure.”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
पतझड़ में भी कब आ सकता था मैं सयाद के ज़िद में, मेरी महफ़िल थी शाख़-ए-नशेमन की कम औराक़ी।
विस्तार
यह शेर एक गहरे मानसिक और भावनात्मक थकावट को बयां करता है। शायर कहते हैं कि जब खुद की हालत ही चरमरा रही हो, जब जीवन की रौनक (औराक़ी) पत्तों की तरह झड़ रही हो, तो किसी और के पागलपन या संघर्ष में पड़ने का क्या मतलब है? यह शेर उस अवस्था को दिखाता है जब व्यक्ति अपनी मौजूदा समस्याओं से जूझ रहा होता है, और नए गमों को सहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
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