ग़ज़ल
ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र-ओ-नाज़ नहीं
ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र-ओ-नाज़ नहीं
यह ग़ज़ल दिखावटी नजाकत और अहंकार को त्यागकर, सच्चे प्रेम और सहजता की खोज करती है। कवि कहता है कि असली शोख़ी और मस्ती में दिखावटी नज़ाकत या घमंड नहीं होता। यह उन प्रेम की तलाश में है जो जीवन से जुड़ा हो, न कि किसी मृत या सजाए गए शिकार की तरह।
गीत सुनें
1
ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र-ओ-नाज़ नहीं
जो नाज़ हो भी तो बे-लज़्ज़त-ए-नियाज़ नहीं
मैं अपने आप की शोख़ी या शराबखाने की मस्ती में घमंड और नखरा नहीं देखता; अगर कोई नखरा है, तो वह एहसान की बेस्वाद मांग नहीं है।
2
निगाह-ए-इश्क़ दिल-ए-ज़िंदा की तलाश में है
शिकार-ए-मुर्दा सज़ा-वार-ए-शहबाज़ नहीं
प्रेम की दृष्टि जीवित हृदय की खोज करती है, न कि मृत शिकार या शानदार (महान) का दंड।
3
मिरी नवा में नहीं है अदा-ए-महबूबी
कि बाँग-ए-सूर-ए-सराफ़ील दिल-नवाज़ नहीं
मेरे प्रेम में महबूब की अदा नहीं है, और न ही सरफिल बाँसुरी की दिल को मोहने वाली आवाज़ है।
4
सवाल-ए-मय न करूँ साक़ी-ए-फ़रंग से मैं
कि ये तरीक़ा-ए-रिंदान-ए-पाक-बाज़ नहीं
मैं विदेशी साक़ी से मदिरा का सवाल नहीं करूँगा, क्योंकि यह शुद्ध रहस्यवादी (रिंद) का रास्ता लापरवाह लोगों के लिए नहीं है।
5
हुई न आम जहाँ में कभी हुकूमत-ए-इश्क़
सबब ये है कि मोहब्बत ज़माना-साज़ नहीं
इस जहाँ में कभी मोहब्बत की हुकूमत नहीं हुई, क्योंकि मोहब्बत ज़माना-साज़ नहीं है।
6
इक इज़्तिराब मुसलसल ग़याब हो कि हुज़ूर
मैं ख़ुद कहूँ तो मिरी दास्ताँ दराज़ नहीं
अगर यह बेचैनी लगातार ग़ायब हो, ऐ हुज़ूर, तो मैं खुद कहूँ तो मेरी कहानी लंबी नहीं है।
7
अगर हो ज़ौक़ तो ख़ल्वत में पढ़ ज़ुबूर-ए-अजम
फ़ुग़ान-ए-नीम-शबी बे-नवा-ए-राज़ नहीं
अगर तुम्हें रुचि हो तो अकेले में ज़ुबूर-ए-अजम पढ़ो, क्योंकि आधी रात के दुःख में रहस्य की कोई आवाज़ नहीं है।
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