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ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र-ओ-नाज़ नहीं
जो नाज़ हो भी तो बे-लज़्ज़त-ए-नियाज़ नहीं

Not in the showiness of the self, or in the arrogance of the tavern, is there pride and conceit; if there is any conceit, it is not the tasteless demand for favor.

अल्लामा इक़बाल
अर्थ

मैं अपने आप की शोख़ी या शराबखाने की मस्ती में घमंड और नखरा नहीं देखता; अगर कोई नखरा है, तो वह एहसान की बेस्वाद मांग नहीं है।

विस्तार

यह शेर 'खुदी' यानी आत्म-सम्मान की बात करता है। शायर कहते हैं कि जब आप अपने आप में सच्चे होते हैं, तो उसमें कोई दिखावटी किबर या नाज़ नहीं होता। अगर कोई नाज़ भी है, तो वह किसी और की ज़रूरत पर टिका हुआ, बे-लज़्ज़त नहीं होता। यह आत्म-सम्मान भीतर से आता है, बाहर की तारीफों पर निर्भर नहीं।

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पाठ
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