ग़ज़ल
ख़ुदी हो इल्म से मोहकम तो ग़ैरत-ए-जिब्रील
ख़ुदी हो इल्म से मोहकम तो ग़ैरत-ए-जिब्रील
यह ग़ज़ल बताती है कि यदि स्वयं को ज्ञान से मज़बूत किया जाए, तो जिब्रील की ग़ैरत का सामना किया जा सकता है। यह बताती है कि कवि को ज्ञान के अज़ाब और इस आग में होने की जानकारी है।
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1
ख़ुदी हो इल्म से मोहकम तो ग़ैरत-ए-जिब्रील
अगर हो इश्क़ से मोहकम तो सूर-ए-इस्राफ़ील
यदि आपका स्वयं (स्व) ज्ञान से मजबूत है, तो वह जिब्रील के उत्साह जैसा है; यदि यह प्रेम से मजबूत है, तो यह इस्राफील की ध्वनि जैसा है।
2
अज़ाब-ए-दानिश-ए-हाज़िर से बा-ख़बर हूँ मैं
कि मैं इस आग में डाला गया हूँ मिस्ल-ए-ख़लील
मैं वर्तमान ज्ञान के कष्ट से परिचित हूँ, कि मुझे खलील की तरह इस आग में डाला गया है।
3
फ़रेब-ख़ुर्दा-ए-मंज़िल है कारवाँ वर्ना
ज़ियादा राहत-ए-मंज़िल से है नशात-ए-रहील
मंज़िल की ख़ुशबू तो महज़ एक भ्रम है, क्योंकि मंज़िल की शांति का नशा, सफ़र के आनंद से कम नहीं होता।
4
नज़र नहीं तो मिरे हल्क़ा-ए-सुख़न में न बैठ
कि नुक्ता-हा-ए-ख़ुदी हैं मिसाल-ए-तेग़-ए-असील
अगर आप नहीं देखेंगे, तो आप मेरे काव्य-समूह में नहीं बैठ सकते, क्योंकि सच्चे स्व के बिंदु एक शुद्ध तलवार की धार के समान हैं।
5
मुझे वो दर्स-ए-फ़रंग आज याद आते हैं
कहाँ हुज़ूर की लज़्ज़त कहाँ हिजाब-ए-दलील
मुझे आज वो विदेशी शिक्षा याद आती है, जहाँ महबूब का नशा और दलील का पर्दा कहाँ है।
6
अँधेरी शब है जुदा अपने क़ाफ़िले से है तू
तिरे लिए है मिरा शोला-ए-नवा क़िंदील
अँधेरी रात है और तुम अपने समूह से अलग हो; तुम्हारे लिए, मेरा चमकता दीपक ही रोशनी है।
7
ग़रीब ओ सादा ओ रंगीं है दस्तान-ए-हरम
निहायत इस की हुसैन इब्तिदा है इस्माईल
हरम की कहानी गरीब, सादी और रंगीन है; यह इस्माइल के हुसैन की शुरुआत है।
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