फ़रेब-ख़ुर्दा-ए-मंज़िल है कारवाँ वर्ना
ज़ियादा राहत-ए-मंज़िल से है नशात-ए-रहील
“The journey itself is a deception, for the bliss of the destination is less intoxicating than the joys of the journey.”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
मंज़िल की ख़ुशबू तो महज़ एक भ्रम है, क्योंकि मंज़िल की शांति का नशा, सफ़र के आनंद से कम नहीं होता।
विस्तार
यह शेर, जो कि अल्लामा इकबाल साहब ने कहा है, हमें मंज़िल और सफ़र के रिश्ते पर सोचने को मजबूर करता है। शायर कहते हैं कि शायद मंज़िल का नशा... बल्कि सफ़र का भ्रम है। इसका मतलब यह नहीं कि मंज़िल बेकार है, बल्कि यह कि मंज़िल की खुशी तो उस उत्साह का ही असर है जो हम अपने सफ़र में लेकर चलते हैं। यानी, असली मज़ा तो रास्ते में ही है।
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