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ग़ज़ल

जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में

जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में

यह ग़ज़ल प्रकृति के सौंदर्य और प्रेम की महफ़िल में जगमगाती रौशनी के विभिन्न स्रोतों का वर्णन करती है। इसमें काशाना-ए-चमन और फूलों की अंजुमन में जुगनू या शम्अ जैसी रौशनी का उल्लेख है। शायर आसमाँ से उतरे सितारे, महताब की किरणें, या किसी ऐसे यात्री की उपमा देते हैं जो ग़ुर्बत में वतन को रोशन करता है, जिससे जीवन की सुंदरता और चमक की भावना प्रकट होती है।

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1
जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में या शम्अ' जल रही है फूलों की अंजुमन में
क्या यह आँगन में जुगनू की रोशनी है, या फूलों के समूह में जलती हुई मोमबत्ती है।
2
आया है आसमाँ से उड़ कर कोई सितारा या जान पड़ गई है महताब की किरन में
आसमान से उड़कर कोई सितारा आया है, या जान पड़ गई है महताब की किरण में।
3
या शब की सल्तनत में दिन का सफ़ीर आया ग़ुर्बत में आ के चमका गुमनाम था वतन में
या रात के साम्राज्य में दिन का दूत आया, और परदेश में आकर वह गुमनाम वतन में चमका।
4
तक्मा कोई गिरा है महताब की क़बा का ज़र्रा है या नुमायाँ सूरज के पैरहन में
क्या यह महताब के वस्त्र से कोई धूल का कण गिरा है, या यह केवल सूरज के पहनावे पर दिखाई देने वाला कोई कण है?
5
हुस्न-ए-क़दीम की इक पोशीदा ये झलक थी ले आई जिस को क़ुदरत ख़ल्वत से अंजुमन में
हुस्न-ए-क़दीम की एक छिपी हुई झलक थी, जिसने उसे प्रकृति की एकांतता से महफ़िल में ला दिया।
6
छोटे से चाँद में है ज़ुल्मत भी रौशनी भी निकला कभी गहन से आया कभी गहन में
छोटे से चाँद में अंधेरा भी है और रोशनी भी, कभी गहरे से निकला, कभी गहरे में आया।
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