ग़ज़ल
अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा
अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा
यह ग़ज़ल प्रेम, आस्था और अस्तित्व के गहरे प्रश्नों को छूती है। शायर यह सवाल उठाता है कि क्या आसमाँ, मोहब्बत या जीवन की हर चीज़ ईश्वर की है या हमारी अपनी। इसमें एक प्रकार की आत्म-खोज और सर्वव्यापी जुड़ाव की भावना व्यक्त की गई है।
गीत सुनें
1
अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा
मुझे फ़िक्र-ए-जहाँ क्यूँ हो जहाँ तेरा है या मेरा
अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा, मुझे फ़िक्र-ए-जहाँ क्यों हो जहाँ तेरा है या मेरा।
2
अगर हंगामा-हा-ए-शौक़ से है ला-मकाँ ख़ाली
ख़ता किस की है या रब ला-मकाँ तेरा है या मेरा
अगर शौक़ से हंगामा है, और वह कोई खाली जगह से है, तो गलती किसकी है, ऐ रब? क्या यह खाली जगह तुम्हारी है या मेरी?
3
उसे सुब्ह-ए-अज़ल इंकार की जुरअत हुई क्यूँकर
मुझे मालूम क्या वो राज़-दाँ तेरा है या मेरा
उसे युगों के आरंभ में इंकार करने की हिम्मत कैसे हुई? मुझे नहीं पता कि वह रहस्य तुम्हारा है या मेरा।
4
मोहम्मद भी तिरा जिबरील भी क़ुरआन भी तेरा
मगर ये हर्फ़-ए-शीरीं तर्जुमाँ तेरा है या मेरा
मोहम्मद भी तेरा है, जिब्रील भी तेरा है, और क़ुरआन भी तेरा है; लेकिन यह मीठा अक्षर—क्या इसका अनुवाद तेरा है या मेरा?
5
इसी कौकब की ताबानी से है तेरा जहाँ रौशन
ज़वाल-ए-आदम-ए-ख़ाकी ज़ियाँ तेरा है या मेरा
इस नभ के प्रकाश से तेरा संसार प्रकाशित है। क्या मानव जाति की चमक तुम्हारी है या मेरी?
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