ग़ज़ल

जिगर को दाग़ मैं मानिंद-ए-लाला क्या करता

جگر کو داغ مین مانند لالہ کیا کرتا

Source: Kulliyat-e-Aatish (Matba Munshi Naval Kishore, Lucknow) · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
जिगर को दाग़ मैं मानिंद-ए-लाला क्या करता लबालब अपने लहू का प्याला क्या करता
मैं अपने दिल को लाला के फूल की तरह दाग़ों से कैसे भरता, और अपने ही ख़ून से भरा प्याला कैसे बनाता।
2
मिला न सर्व को कुछ अपनी रास्ती में फल कुलाह-ए-कज जो न करता तो लाला क्या करता
सीधे खड़े रहने वाले सर्व को अपनी सीधाई का कोई फल नहीं मिला; अगर लाला अपनी टेढ़ी टोपी न पहनता तो और क्या करता।
3
जरीदा मैं रह-ए-पुर-ख़ून-ए-इश्क़ से गुज़रा जरस से क़ाफ़िला में बहस-ए-नाला क्या करता
मैं अकेला ही इश्क़ की ख़ून से भरी राह से गुज़रा, सबसे अलग। काफ़िले की घंटी से अपनी आह-ओ-नाले की बहस मैं क्यों करता?
4
जुनून-ए-इश्क़ में रहना था इम्तियाज़ न कुछ चकोर तौक़-ए-गुलू मह का हाला क्या करता
इश्क़ के जुनून में कोई भेद बाक़ी न रहा; चकोर चाँद के हाले को अपने गले का तौक़ (हार) कैसे बना सकता था।
5
बचा क्या उसे तोड़ा जो सग-ए-दरिया के हुबाब ले के ये ख़ाली प्याला क्या करता
जब मैंने दरिया का प्याला ही तोड़ दिया तो फिर तोड़ने को क्या बचा? बुलबुला ले लेने के बाद इस ख़ाली प्याले का मैं क्या करता।
6
न खाया ग़ुस्सा कभी ख़्वांचा से क़िस्मत के फंसे जो हलक़ में मैं वो निवाला क्या करता
मैंने क़िस्मत के थाल से परोसे गए ग़ुस्से को कभी नहीं निगला; जो निवाला मेरे गले में फंस गया, उसका मैं क्या करता।
7
बला-ए-बद हुई दाग़ों से सर्दी-ए-काफ़ूर सुलूक-ए-नेक ज़राअत से ज़ाला क्या करता
दाग़ों की वजह से कपूर की ठंडक एक बुरी बला बन गई; भला ओले खेती के साथ कोई अच्छा बरताव कैसे कर सकते थे।
8
दिया नविश्ता न उस बुत को दिल के तोड़े में ख़ुदा के घर का भला मैं क़बाला क्या करता
मैंने अपने दिल के टूटने के समय उस बुत को कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं दिया; भला मैं ख़ुदा के घर का मालिकाना पट्टा कैसे लिख देता?
9
सफ़ा हुआ न रियाज़त से नफ़्स-ए-अम्मारा कोई नजासत-ए-सग का इज़ाला क्या करता
रियाज़त और साधना से भी नफ़्स-ए-अम्मारा (बुराई की ओर उकसाने वाला मन) पाक न हुआ; भला कोई कुत्ते की नापाकी को कैसे दूर कर सकता था।
10
लगी हो आग जो कम्बल कभी उड़ाया है तिरे बरहना शै गर्मी-ए-दोशाला क्या करता
जब कंबल में आग लग जाए तो क्या कभी उसे उड़ाकर फेंका है? ऐ नंगे बदन वाले, दोशाले की गर्मी तेरे लिए क्या कर सकती थी।
11
न करती अक़्ल अगर हफ़्त आसमान की सैर कोई ये साथ वरक़ का रिसाला क्या करता
अगर बुद्धि सातों आसमानों की सैर न करती, तो कोई इस कुछ पन्नों के रिसाले को साथ रखकर क्या करता।
12
मिरी तरफ़ जो उन्हें खींचती कशिश दिल की बुतों को बरहमनों का हवाला क्या करता
अगर दिल की वही कशिश उन्हें मेरी तरफ़ खींचती, तो मैं बुतों को बरहमनों के हवाले क्यों करता।
13
किसी ने मोल न पूछा दिल-ए-शिकस्ता का कोई ख़रीद के टूटा प्याला क्या करता
किसी ने टूटे हुए दिल का दाम तक नहीं पूछा; भला कोई टूटा हुआ प्याला ख़रीद कर क्या करता।
14
अरूस-ए-दहर से बू-ए-वफ़ा नहीं आती भला मैं बकू का इस के इज़ाला क्या करता
इस संसार रूपी दुल्हन से वफ़ादारी की कोई ख़ुशबू नहीं आती; तो भला मैं इसका क्या इलाज या सुधार कर सकता था।
15
सर-ओ-सुफ़्ता भी होता तो लुत्फ़ था आतिश अकेले पी के शराब-ए-दोसाला क्या करता
अगर कोई मदहोश साथी होता तो मज़ा आता, ऐ आतिश; अकेले बैठकर इस दो साल पुरानी शराब को पीकर मैं क्या करता।
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