न करती अक़्ल अगर हफ़्त आसमान की सैर — ख़्वाजा हैदर अली आतिश

न करती अक़्ल अगर हफ़्त आसमान की सैर कोई ये साथ वरक़ का रिसाला क्या करता

“Had not the intellect roamed through the seven heavens, who would have cared for this slender tract of paper's leaves?”

— ख़्वाजा हैदर अली आतिश

अर्थ

अगर बुद्धि सातों आसमानों की सैर न करती, तो कोई इस कुछ पन्नों के रिसाले को साथ रखकर क्या करता।

विस्तार

यह शेर इंसानी अक़्ल की बेचैन जिज्ञासा का जश्न मनाता है। शायर कल्पना करते हैं कि बुद्धि सातों आसमानों की सैर करती है और अस्तित्व के गहरे रहस्य को खोजती है। इसी यात्रा की वजह से हमारे विचार, हमारे सवाल और हमारी लिखाई में असली मायने आते हैं। वे पूछते हैं: अगर मन इन अनंत आसमानों में न भटकता, तो काग़ज़ के इन चंद वरक़ों का क्या मोल होता? यानी किसी किताब या संदेश का महत्व तभी है जब इंसानी रूह दूर तक पहुँचे और गहराई से सोचे। सच की यही तलाश शब्दों को जीवन देती है। ब्रह्मांड को समझने की इस चाह के बिना काग़ज़ बस खाली रह जाता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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