लगी हो आग जो कम्बल कभी उड़ाया है — ख़्वाजा हैदर अली आतिश

लगी हो आग जो कम्बल कभी उड़ाया है तिरे बरहना शै गर्मी-ए-दोशाला क्या करता

“When the blanket caught fire, did you ever fling it off? O naked one, what could the warmth of a shawl have done for you?”

— ख़्वाजा हैदर अली आतिश

अर्थ

जब कंबल में आग लग जाए तो क्या कभी उसे उड़ाकर फेंका है? ऐ नंगे बदन वाले, दोशाले की गर्मी तेरे लिए क्या कर सकती थी।

विस्तार

शायर एक कोमल बात कह रहे हैं कि असली गर्मी बाहर की चीज़ों से नहीं, बल्कि भीतर से, प्रेम या जज़्बे से आती है। वे कहते हैं कि जब दिल में आग पहले से जल रही हो, तो कोई कम्बल ओढ़ने की परवाह नहीं करता। और जो इंसान बिल्कुल खुला और बेपर्दा खड़ा हो, उसके लिए महँगे दोशाले की गर्मी का कोई मोल नहीं। मतलब यह कि जो तपिश चाहत और लगन से मिलती है, उसकी बराबरी कोई बाहरी आराम नहीं कर सकता। अगर भीतर से तुम गर्म हो, तो ओढ़ने की ज़रूरत नहीं। और अगर दिल ठंडा है, तो कोई कीमती शॉल उस खालीपन को नहीं भर सकती।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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