जुनून-ए-इश्क़ में रहना था इम्तियाज़ न कुछ — ख़्वाजा हैदर अली आतिश

जुनून-ए-इश्क़ में रहना था इम्तियाज़ न कुछ चकोर तौक़-ए-गुलू मह का हाला क्या करता

“In love's wild frenzy no distinction could remain— how could the chakor make the moon's halo a collar round its throat?”

— ख़्वाजा हैदर अली आतिश

अर्थ

इश्क़ के जुनून में कोई भेद बाक़ी न रहा; चकोर चाँद के हाले को अपने गले का तौक़ (हार) कैसे बना सकता था।

विस्तार

इश्क़ के जुनून में सारे भेद मिट जाते हैं। जब आप पूरी तरह समर्पित हो जाते हैं, तो एक चीज़ को दूसरी से अलग करना मुमकिन नहीं रहता। शायर एक सुंदर तस्वीर खींचते हैं: चकोर पक्षी चाँद का दीवाना माना जाता है, वह उसे अपलक निहारता रहता है। यहाँ शायर कल्पना करते हैं कि चाँद के चारों ओर का हाला चकोर के गले का तौक़ बन जाता है। इतने गहरे इश्क़ में वह उस हाले को महज़ रोशनी का घेरा समझकर अलग नहीं रख पाता, क्योंकि प्रेम उन्हें बाँध देता है। संदेश कोमल पर गहरा है: सच्चा प्रेम सीमाएँ मिटा देता है। जब आप भक्ति में खो जाते हैं, तो नापना-तौलना छूट जाता है और सब कुछ प्रियतम में एक हो जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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