ग़ज़ल
सताइश-गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़-ए-रिज़वाँ का
سَتائِش گَر ہے زاہِد اِس قَدَر جِس باغِ رِضواں کا
यह ग़ज़ल पारंपरिक स्वर्ग के प्रति गहरी उपेक्षा व्यक्त करती है, उसे शायर के आंतरिक जगत की तुलना में तुच्छ मानती है। यह प्रेम के गहन दर्द में डूब जाती है, जहाँ रक्त की बूँदें पीड़ा के बहुमूल्य प्रतीक बन जाती हैं। अत्याचार और यंत्रणा के बावजूद, शायर का दुख अथाह है, और उनके दिल का हर दाग भविष्य की चमक और भव्यता के लिए एक बीज के रूप में प्रस्तुत होता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
सताइश-गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़-ए-रिज़वाँ का
वो इक गुलदस्ता है हम बे-ख़ुदों के ताक़-ए-निस्याँ का
वह स्वर्ग जिसकी ज़ाहिद इतनी प्रशंसा करता है, वह हम दीवानों के लिए भुलावे की ताक पर रखा एक गुलदस्ता मात्र है।
2
बयाँ क्या कीजिए बेदाद-ए-काविश-हा-ए-मिज़गाँ का
कि हर यक क़तरा-ए-ख़ूँ दाना है तस्बीह-ए-मरजाँ का
पलकों की बेदर्दी से होने वाले घावों का क्या वर्णन करें, जब खून का हर एक कतरा मूंगे की माला का दाना बन गया है।
3
न आई सतवत-ए-क़ातिल भी माने मेरे नालों को
लिया दाँतों में जो तिनका हुआ रेशा नियस्ताँ का
मेरे रोने की आवाज़ इतनी प्रबल थी कि कातिल का रौब भी उसे खामोश न कर सका। जो एक तिनका मैंने दाँतों में लिया था, वह एक विशाल नरकट के जंगल के रेशे जैसा प्रतीत हुआ।
4
दिखाऊँगा तमाशा दी अगर फ़ुर्सत ज़माने ने
मिरा हर दाग़-ए-दिल इक तुख़्म है सर्व-ए-चराग़ाँ का
यदि समय ने मुझे अवसर दिया, तो मैं एक भव्य प्रदर्शन दिखाऊँगा। मेरे दिल का हर घाव एक ऐसे बगीचे के लिए बीज है जो चिरागों से रोशन सरू के पेड़ों से भरा होगा।
5
किया आईना-ख़ाने का वो नक़्शा तेरे जल्वे ने
करे जो परतव-ए-ख़ुर्शीद आलम शबनमिस्ताँ का
आपके सौंदर्य ने ऐसा शीश महल का दृश्य बनाया, जैसे सूरज की किरणें ओस से भरी दुनिया को जगमगा देती हैं।
6
मिरी ता'मीर में मुज़्मर है इक सूरत ख़राबी की
हयूला बर्क़-ए-ख़िर्मन का है ख़ून-ए-गर्म दहक़ाँ का
मेरी रचना में ही विनाश का एक रूप छिपा है। फसल नष्ट करने वाली बिजली का मूल तत्व किसान का गर्म खून है।
7
उगा है घर में हर सू सब्ज़ा वीरानी तमाशा कर
मदार अब खोदने पर घास के है मेरे दरबाँ का
घर में हर तरफ घास उग आई है, इस वीराने का नज़ारा देखो! अब मेरे दरबान का काम सिर्फ घास खोदना है।
8
ख़मोशी में निहाँ ख़ूँ-गश्ता लाखों आरज़ूएँ हैं
चराग़-ए-मुर्दा हूँ मैं बे-ज़बाँ गोर-ए-ग़रीबाँ का
मेरी खामोशी में लाखों खून से सनी आरज़ूएँ छिपी हैं। मैं गरीबों के खामोश कब्रिस्तान का एक बुझा हुआ चिराग हूँ।
9
हनूज़ इक परतव-ए-नक़्श-ए-ख़याल-ए-यार बाक़ी है
दिल-ए-अफ़सुर्दा गोया हुजरा है यूसुफ़ के ज़िंदाँ का
अभी तक महबूब के ख़्याल की एक परछाई बाकी है। उदास हृदय मानो यूसुफ़ के कारागार का एक कमरा है।
10
बग़ल में ग़ैर की आज आप सोते हैं कहीं वर्ना
सबब क्या ख़्वाब में आ कर तबस्सुम-हा-ए-पिन्हाँ का
कवि अनुमान लगाता है कि आज उनका प्रिय किसी और की बाहों में सो रहा है, अन्यथा मेरे सपने में आकर इतनी छिपी हुई मुस्कानें देने का क्या कारण होता?
11
नहीं मा'लूम किस किस का लहू पानी हुआ होगा
क़यामत है सरिश्क-आलूदा होना तेरी मिज़्गाँ का
यह नहीं पता कि कितने लोगों का खून पानी हो गया होगा; तुम्हारी आँसुओं से भीगी पलकें एक क़यामत हैं।
12
नज़र में है हमारी जादा-ए-राह-ए-फ़ना 'ग़ालिब'
कि ये शीराज़ा है आलम के अज्ज़ा-ए-परेशाँ का
ग़ालिब, विनाश का मार्ग हमारी नज़रों में स्पष्ट है, क्योंकि यह संसार के बिखरे हुए हिस्सों को एक साथ जोड़ने वाला बंधन है।
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