बयाँ क्या कीजिए बेदाद-ए-काविश-हा-ए-मिज़गाँ का — मिर्ज़ा ग़ालिब
बयाँ क्या कीजिए बेदाद-ए-काविश-हा-ए-मिज़गाँ का
कि हर यक क़तरा-ए-ख़ूँ दाना है तस्बीह-ए-मरजाँ का
“How can one recount the tyranny of eyelashes' piercing,When every drop of blood forms a coral rosary's bead?”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
पलकों की बेदर्दी से होने वाले घावों का क्या वर्णन करें, जब खून का हर एक कतरा मूंगे की माला का दाना बन गया है।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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