न आई सतवत-ए-क़ातिल भी माने मेरे नालों को — मिर्ज़ा ग़ालिब

न आई सतवत-ए-क़ातिल भी माने मेरे नालों को लिया दाँतों में जो तिनका हुआ रेशा नियस्ताँ का

“Not even the killer's awe could hush my mournful cries,The straw I took in teeth, a vast reed-bed implies.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

मेरे रोने की आवाज़ इतनी प्रबल थी कि कातिल का रौब भी उसे खामोश न कर सका। जो एक तिनका मैंने दाँतों में लिया था, वह एक विशाल नरकट के जंगल के रेशे जैसा प्रतीत हुआ।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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