ग़ज़ल
सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं
سب کہاں کچھ لالہ و گل میں نمایاں ہو گئیں
यह ग़ज़ल सुंदरता और जीवन की क्षणभंगुरता पर गहनता से विचार करती है। यह इस बात का दुख व्यक्त करती है कि कितनी ही अनुपम सूरतें और जीवंत अनुभव समय के साथ खो जाते हैं, कुछ धरती में छिप जाते हैं और कुछ विस्मृति के ताक़ पर धूमिल हो जाते हैं, जिनमें से बहुत कम ही कभी दृष्टिगोचर होते हैं। यह कविता हानि और अस्तित्व की नश्वरता का एक मार्मिक बोध कराती है।
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1
सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं
सारी सुंदरताएँ कहाँ दिखती हैं? कुछ ही लाला और गुलाब में प्रकट हुईं। न जाने कितनी सुंदर आकृतियाँ मिट्टी में ऐसी छिपी रह गईं।
2
याद थीं हम को भी रंगा-रंग बज़्म-आराईयाँ
लेकिन अब नक़्श-ओ-निगार-ए-ताक़-ए-निस्याँ हो गईं
हमें भी बहुत-सी रंगीन और सजी हुई महफ़िलें याद थीं, लेकिन अब वे भूलने की मेहराब पर बने नक़्श-ओ-निगार जैसी हो गई हैं।
3
थीं बनात-उन-नाश-ए-गर्दुं दिन को पर्दे में निहाँ
शब को उन के जी में क्या आई कि उर्यां हो गईं
दिन में بنات-उन-नाश-ए-गर्दुं (सप्तर्षि के तारे) परदे में छिपे हुए थे। रात को उनके मन में क्या आया कि वे प्रकट हो गए।
4
क़ैद में याक़ूब ने ली गो न यूसुफ़ की ख़बर
लेकिन आँखें रौज़न-ए-दीवार-ए-ज़िंदाँ हो गईं
यूसुफ़ के क़ैद में होने के दौरान याक़ूब को उसकी कोई ख़बर नहीं मिली, लेकिन याक़ूब की आँखें जेल की दीवार की खिड़की बन गईं।
5
सब रक़ीबों से हों ना-ख़ुश पर ज़नान-ए-मिस्र से
है ज़ुलेख़ा ख़ुश कि महव-ए-माह-ए-कनआँ हो गईं
जुलेखा सभी प्रतिद्वंद्वियों से नाखुश है, लेकिन मिस्र की महिलाओं से खुश है क्योंकि वे सभी 'कनान के चाँद' (यूसुफ) में लीन हो गईं।
6
जू-ए-ख़ूँ आँखों से बहने दो कि है शाम-ए-फ़िराक़
मैं ये समझूँगा कि शमएँ दो फ़रोज़ाँ हो गईं
अपनी आँखों से खून की धाराएँ बहने दो, क्योंकि यह जुदाई की रात है। मैं यह समझूँगा कि दो मोमबत्तियाँ जल गई हैं।
7
इन परी-ज़ादों से लेंगे ख़ुल्द में हम इंतिक़ाम
क़ुदरत-ए-हक़ से यही हूरें अगर वाँ हो गईं
हम इन परी-ज़ादों से जन्नत में बदला लेंगे, अगर ईश्वर की शक्ति से यही हूरें वहाँ मौजूद हुईं।
8
नींद उस की है दिमाग़ उस का है रातें उस की हैं
तेरी ज़ुल्फ़ें जिस के बाज़ू पर परेशाँ हो गईं
उसकी नींद है, उसका दिमाग़ है और उसकी रातें हैं, जिसकी बाँहों पर तुम्हारी ज़ुल्फ़ें बिखर गईं।
9
मैं चमन में क्या गया गोया दबिस्ताँ खुल गया
बुलबुलें सुन कर मिरे नाले ग़ज़ल-ख़्वाँ हो गईं
मैं जैसे ही बाग में गया, ऐसा लगा जैसे कोई स्कूल खुल गया हो। मेरी आहें सुनकर बुलबुलें भी ग़ज़लें गाने लगीं।
10
वो निगाहें क्यूँ हुई जाती हैं या-रब दिल के पार
जो मिरी कोताही-ए-क़िस्मत से मिज़्गाँ हो गईं
हे प्रभु, वो नज़रें मेरे दिल के आर-पार क्यों हो रही हैं, जो मेरी किस्मत की कमी के कारण अब केवल पलकें बन गई हैं।
11
बस-कि रोका मैं ने और सीने में उभरीं पै-ब-पै
मेरी आहें बख़िया-ए-चाक-ए-गरेबाँ हो गईं
मैंने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की, फिर भी मेरे सीने से मेरी आहें लगातार, एक के बाद एक निकलती रहीं। मेरी ये आहें मेरे फटे हुए गिरेबान के टाँके बन गईं।
12
वाँ गया भी मैं तो उन की गालियों का क्या जवाब
याद थीं जितनी दुआएँ सर्फ़-ए-दरबाँ हो गईं
अगर मैं वहाँ गया भी, तो उनकी गालियों का क्या जवाब दूँगा? मुझे जितनी भी दुआएँ याद थीं, वे सब दरबान पर खर्च हो गईं।
13
जाँ-फ़िज़ा है बादा जिस के हाथ में जाम आ गया
सब लकीरें हाथ की गोया रग-ए-जाँ हो गईं
जिसके हाथ में जाम आ गया, उसके लिए शराब प्राणदायक है। ऐसा लगता है जैसे हाथ की सभी लकीरें जान की नसें बन गई हों।
14
हम मुवह्हिद हैं हमारा केश है तर्क-ए-रुसूम
मिल्लतें जब मिट गईं अजज़ा-ए-ईमाँ हो गईं
हम एकेश्वरवादी हैं, हमारा सिद्धांत रीति-रिवाजों का त्याग करना है। जब विभिन्न मान्यताएं और धर्म मिट गए, तो वे वास्तविक विश्वास के अंग बन गए।
15
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं
जब इंसान दुख का आदी हो जाता है, तो दुख स्वयं मिट जाता है। मुझ पर इतनी मुश्किलें आईं कि वे आसान हो गईं।
16
यूँ ही गर रोता रहा 'ग़ालिब' तो ऐ अहल-ए-जहाँ
देखना इन बस्तियों को तुम कि वीराँ हो गईं
यदि 'ग़ालिब' इसी तरह रोता रहा, तो ऐ दुनिया के लोगों, तुम देखना कि ये बस्तियाँ भी वीरान हो गईं।
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