ग़ज़ल
रहम कर ज़ालिम कि क्या बूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
رحم کر ظالم کہ کیا بودِ چراغِ کُشتہ ہے
यह ग़ज़ल बुझते हुए प्रेम, खोई हुई आशा और अतीत के उदास अवशेषों के विषयों को, एक बुझे हुए चिराग़ के रूपक का उपयोग करते हुए, मार्मिक रूप से व्यक्त करती है। यह वफ़ादारी की क्षणभंगुरता और नीरसता तथा अधूरी इच्छाओं के बीच खुशी खोजने के संघर्ष की बात करती है। छंद एक बीते हुए युग की निराशा और शेष निशानों को खूबसूरती से दर्शाते हैं।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
रहम कर ज़ालिम कि क्या बूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
नब्ज़-ए-बीमार-ए-वफ़ा दूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
अत्याचारी, रहम कर, क्योंकि बुझे हुए चिराग़ का अस्तित्व ही क्या है? वफ़ा के बीमार की नब्ज़ तो बुझे हुए चिराग़ का धुआँ मात्र है।
2
दिल-लगी की आरज़ू बेचैन रखती है हमें
वर्ना याँ बे-रौनक़ी सूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
मनोरंजन की इच्छा हमें बेचैन रखती है। अन्यथा, इस दुनिया की नीरसता एक बुझे हुए चिराग़ के लाभ के समान है, जिसका अर्थ है कुछ भी नहीं या केवल अंधेरा।
3
नश्शा-ए-मय बे-चमन दूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
जाम दाग़-ए-शो'ला-अंदूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
बग़ीचे के आकर्षण के बिना शराब का नशा बुझे हुए चिराग़ का धुआँ मात्र है। शराब का प्याला उसी बुझे हुए चिराग़ के ज्वाला-रंजित दाग़ जैसा है।
4
दाग़ हम दीगर हैं अहल-ए-बाग़ गर गुल हो शहीद
लाला चश्म-ए-हसरत-आलूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
बाग़ के लोगों, हमारे घाव भिन्न हैं, भले ही गुलाब शहीद हो जाए। लाला एक बुझे हुए चिराग़ की हसरत से भरी आँख है।
5
शोर है किस बज़्म की अर्ज़-ए-जराहत-ख़ाना का
सुब्ह यक-बज़्म-ए-नमक सूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
किस महफ़िल के ज़ख्मों के घर की इस अर्ज़ (पुकार) का क्या शोर है? सुबह नमक की एक महफ़िल है, बुझे हुए चिराग़ का यह सूद (लाभ) है।
6
ना-मुराद-ए-जल्वा हर 'आलम में हसरत गुल करे
लाला दाग़-ए-शो'ला फ़र्सूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
हर दुनिया में दर्शन की अधूरी इच्छा फूल की तरह खिले। लाला (पोस्त) का काला दाग़, बुझे हुए दीपक की लौ का घिसा-पिटा निशान है।
7
हो जहाँ तेरा दिमाग़-ए-नाज़ मस्त-ए-बे-ख़ुदी
ख़्वाब-ए-नाज़-ए-गुल-रुख़ाँ दूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
जहाँ तुम्हारा गर्वित मन परमानंद में लीन हो, वहाँ सुंदर मुखियों के नाजुक सपने बुझे हुए दीपक का धुआँ मात्र हैं।
8
है दिल-अफ़सुर्दा दाग़-ए-शोख़ी-ए-मतलब 'असद'
शो'ला आख़िर फ़ाल-ए-मक़्सूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
मेरा दिल साहसी इच्छाओं के दाग़ से दुखी है, असद; अंततः, लौ एक बुझे हुए दीपक का नियत परिणाम है।
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