ग़ज़ल
रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है
رفتارِ عمر قطعِ رہِ اضطراب ہے
यह ग़ज़ल जीवन की क्षणभंगुरता और बेचैन यात्रा पर विचार करती है। इसमें स्थिरता के घायल होने और मानवीय अनुभवों की विशालता को दर्शाया गया है, और दुनिया की सतही धारणाओं से भ्रमित न होने का आग्रह किया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है
इस साल के हिसाब को बर्क़ आफ़्ताब है
जीवन की तेज़ गति बेचैनी के मार्ग को छोटा करती है। इस साल के हिसाब के लिए, बिजली ही सूरज है (जो अत्यधिक तेज़ी दर्शाती है)।
2
मीना-ए-मय है सर्व नशात-ए-बहार से
बाल-ए-तदरौ जल्वा-ए-मौज-ए-शराब है
शराब का प्याला बहार की खुशी से सरू के पेड़ जैसा है। तीतर का पंख शराब की लहर का चमकता हुआ रूप है।
3
ज़ख़्मी हुआ है पाश्ना पा-ए-सबात का
ने भागने की गूँ न इक़ामत की ताब है
स्थिरता का आधार (एड़ी) घायल हो गया है; न भागने की शक्ति बची है, न रुकने की।
4
जादाद-ए-बादा-नोशी-ए-रिन्दाँ है शश-जिहत
ग़ाफ़िल गुमाँ करे है कि गेती ख़राब है
शराब पीने वालों का दायरा छहों दिशाओं में फैला हुआ है; लापरवाह व्यक्ति सोचता है कि दुनिया खराब हो गई है।
5
नज़्ज़ारा क्या हरीफ़ हो उस बर्क़-ए-हुस्न का
जोश-ए-बहार जल्वे को जिस के नक़ाब है
उस सौंदर्य की बिजली का मुकाबला कोई नज़ारा कैसे कर सकता है, जिसकी भव्यता को वसंत का जोश ही ढके हुए है।
6
मैं ना-मुराद दिल की तसल्ली को क्या करूँ
माना कि तेरे रुख़ से निगह कामयाब है
मैं इस नाकाम दिल को कैसे तसल्ली दूँ? भले ही मेरी नज़र तेरे चेहरे को देखने में कामयाब हो गई हो।
7
गुज़रा 'असद' मसर्रत-ए-पैग़ाम-ए-यार से
क़ासिद पे मुझ को रश्क-ए-सवाल-ओ-जवाब है
'असद' महबूब के पैग़ाम की ख़ुशी में खो गया था। लेकिन मुझे उस क़ासिद (संदेशवाहक) पर सवाल-जवाब करने के अवसर के लिए ईर्ष्या हो रही है।
8
ज़ाहिर है तर्ज़-ए-क़ैद से सय्याद की ग़रज़
जो दाना दाम में है सो अश्क-ए-कबाब है
शिकारी का मक़सद उसके फँसाने के तरीक़े से स्पष्ट है; जाल में पड़ा दाना तो कबाब का आँसू है।
9
बे-चश्म-ए-दिल न कर हवस-ए-सैर-ए-लाला-ज़ार
या'नी ये हर वरक़ वरक़-ए-इंतिख़ाब है
हृदय की दृष्टि के बिना लालज़र में घूमने की इच्छा न करें, क्योंकि इसका हर पत्ता चुनाव और गहरे अर्थ का एक पृष्ठ है।
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