नज़्ज़ारा क्या हरीफ़ हो उस बर्क़-ए-हुस्न का — मिर्ज़ा ग़ालिब

नज़्ज़ारा क्या हरीफ़ हो उस बर्क़-ए-हुस्न का जोश-ए-बहार जल्वे को जिस के नक़ाब है

“How can any gaze contend with beauty's lightning flash, Whose radiant glory is veiled by spring's own vibrant dash?”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

उस सौंदर्य की बिजली का मुकाबला कोई नज़ारा कैसे कर सकता है, जिसकी भव्यता को वसंत का जोश ही ढके हुए है।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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