मैं ना-मुराद दिल की तसल्ली को क्या करूँ — मिर्ज़ा ग़ालिब
मैं ना-मुराद दिल की तसल्ली को क्या करूँ
माना कि तेरे रुख़ से निगह कामयाब है
“What can I do for the solace of this unfulfilled heart? Even if my gaze finds success in beholding your face.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
मैं इस नाकाम दिल को कैसे तसल्ली दूँ? भले ही मेरी नज़र तेरे चेहरे को देखने में कामयाब हो गई हो।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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