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ग़ज़ल

न पूछ नुस्ख़ा-ए-मरहम जराहत-ए-दिल का

نہ پوچھ نسخۂ مرہم جراحتِ دل کا
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 7 shers· radif: है

यह ग़ज़ल दिल के गहरे ज़ख्मों और उनकी पीड़ा का मार्मिक चित्रण करती है, जहाँ उनका मरहम हीरे के टुकड़ों के समान बताया गया है जो पीड़ा को और बढ़ा देता है। यह महबूब की लंबे इंतजार के बाद मिली बेपरवाह निगाह और इश्क़ के मुस्तकिल मातम का जिक्र करती है। शायर बताता है कि हुस्न के पीछे भी गहरा, दबा हुआ ग़म छुपा है।

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1
पूछ नुस्ख़ा-ए-मरहम जराहत-ए-दिल का कि उस में रेज़ा-ए-अल्मास जुज़्व-ए-आ'ज़म है
दिल के ज़ख़्म के मरहम का नुस्खा न पूछो, क्योंकि उसमें हीरे का चूरा मुख्य घटक है।
2
बहुत दिनों में तग़ाफ़ुल ने तेरे पैदा की वो इक निगह कि ब-ज़ाहिर निगाह से कम है
बहुत दिनों की तुम्हारी उपेक्षा के बाद वह एक नज़र सामने आई, जो दिखने में एक सामान्य नज़र से भी कम है।
3
बहार-ए-ता'ज़ियत आबाद-ए-'इश्क़ मातम है कि तेग़-ए-यार हिलाल-ए-मह-ए-महरम है
शोक की बहार प्रेम का बसा हुआ मातम है, क्योंकि प्रियतम की तलवार मुहर्रम के महीने का नया चाँद है।
4
ब-रेहन-ए-ज़ब्त है आईना-बंदी-ए-गौहर वगर्ना बहर में हर क़तरा चश्म-ए-पुर-नम है
मोती की चमक और सुंदरता उसके संयम (नियंत्रित बनावट) के कारण है। अन्यथा, समुद्र की हर बूँद एक नम आँख होती।
5
चमन में कौन है तर्ज़-आफ़रीन-ए-शेवा-ए-'इश्क़ कि गुल है बुलबुल-ए-रंगीन- व बैज़ा शबनम है
चमन में इश्क़ की शैली का आविष्कारक कौन है, जब फूल स्वयं रंगीन बुलबुल है और अंडा ओस है?
6
अगर होवे रग-ए-ख़्वाब सर्फ़-ए-शीराज़ा तमाम दफ़्तर-ए-रब्त-ए-मिज़ाज बरहम है
अगर सपनों का नाज़ुक धागा बांधने और व्यवस्थित करने में खर्च न हो, तो स्वभाव की सारी व्यवस्था और सामंजस्य बिगड़ जाता है।
7
'असद' ब-नाज़ुकी-ए-तब'-ए-आरज़ू इंसाफ़ कि एक वह्म-ए-ज़'ईफ़-ओ-ग़म-ए-दो-'आलम है
असद, आरज़ू (इच्छा) के स्वभाव की नाजुकता पर विचार कर कि यह एक कमज़ोर भ्रम मात्र है, फिर भी इसमें दोनों जहानों का दुख समाया हुआ है।
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