ग़ज़ल

कार-गाह-ए-हस्ती में लाला दाग़-सामाँ है

کارگاہِ ہستی میں لالہ داغ ساماں ہے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 7 shers· radif: है

यह ग़ज़ल अस्तित्व के अंतर्निहित दुःख और बेचैनी को दर्शाती है, जीवन को एक ऐसी कार्यशाला के रूप में चित्रित करती है जहाँ सुंदरता और पीड़ा गहराई से गुंथी हुई हैं। यह बताती है कि शांति और सुंदरता के तत्व भी, जैसे एक लाला या खिलती हुई कली, छिपे हुए दाग़ और चिंताओं को वहन करते हैं। कवि जीवन की उथल-पुथल की असहनीय प्रकृति और सत्य तथा सौंदर्य का अनुभव करने की गहरी कीमत पर चिंतन करता है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
कार-गाह-ए-हस्ती में लाला दाग़-सामाँ है बर्क़-ए-ख़िर्मन-ए-राहत ख़ून-ए-गर्म-ए-दहक़ाँ है
सृष्टि की कार्यशाला में, लाला (ट्यूलिप) अपने दाग़ को ही अपना सर्वस्व और पहचान मानता है। सुख और आराम की फसल को नष्ट करने वाली बिजली किसान का गर्म रक्त है।
2
ग़ुंचा ता शगुफ़्तन-हा बर्ग-ए-आफ़ियत मा'लूम बा-वजूद-ए-दिल-जमई ख़्वाब-ए-गुल परेशाँ है
कली से फूल बनने तक शांति का पत्ता ज्ञात होता है। फिर भी, दिल के शांत होने के बावजूद, फूल का सपना परेशान है।
3
हम से रंज-ए-बेताबी किस तरह उठाया जाए दाग़ पुश्त-ए-दस्त-ए-इज्ज़ शो'ला ख़स-ब-दंदाँ है
हम इस तीव्र बेचैनी को कैसे सहन कर सकते हैं? हमारी बेबसी का निशान साफ दिख रहा है, और शक्तिशाली ज्वाला भी इतनी लाचार है कि वह अपने दाँतों में तिनका लिए हुए है, उसे जला भी नहीं सकती।
4
हैरत तपीदन-हा ख़ूँ बहा-ए-दीदन-हा रंग-ए-गुल के पर्दे में आईना पुर-अफ़्शाँ है
हैरत का धड़कना देखने का खून-बहा है; क्योंकि गुलाब के रंग के परदे में आईना चमकता है।
5
'इश्क़ के तग़ाफ़ुल से हर्ज़ा-गर्द है 'आलम रू-ए-शश-जिहत-आफ़ाक़ पुश्त-ए-चश्म-ए-ज़िन्दाँ है
प्रेम की उपेक्षा से दुनिया बेमकसद भटकती रहती है। छहों दिशाओं वाला ब्रह्मांड भी किसी जेल की आँख की पीठ या एक अनदेखी नज़र जैसा है, जो एक सीमित और अनसुनी जगह का एहसास कराता है।
6
गुल-ब-कोह अज़ लाला बज़्म-ए-साज़-ए-बेताबी मिस्ल-ए-दूद-ए-मिजमरहा दाग़ बाल अफ़्शाँ है
पहाड़ पर लगे लाले के फूलों से बेचैनी की एक महफ़िल सजी है। घाव, धूपदान के धुएँ की तरह, अपनी लटें फैला रहा है।
7
ऐ करम न हो ग़ाफ़िल वर्ना है 'असद' बे-दिल बे-गुहर सदफ़ गोया पुश्त-ए-चश्म-ए-नैसाँ है
ऐ करम, लापरवाह मत हो, नहीं तो 'असद' बे-दिल हो जाएगा। बिना मोती का सीप ऐसे है जैसे नैसाँ की आँख का फिर जाना, जिसमें उसे कुछ भी कीमती नहीं मिलता।
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