ग़ज़ल
जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार
جز قیس اور کوئی نہ آیا بروئے کار
यह ग़ज़ल गहन, एकाकी प्रेम और पीड़ा से प्राप्त ज्ञान के विषयों पर प्रकाश डालती है। यह दर्शाती है कि गहरा जुनून विशाल स्थानों को भी संकीर्ण महसूस करा सकता है, और यह कि पागलपन या दुख दिल के घावों की वास्तविक प्रकृति को उजागर कर सकता है, जो अक्सर धुएँ के समान क्षणिक होते हैं। कवि सपनों और इच्छाओं की क्षणभंगुर प्रकृति पर चिंतन करते हैं, यह निष्कर्ष निकालते हुए कि जागने पर वे न तो लाभ छोड़ते हैं और न ही हानि, और यह कि अतीत के दुख से मिले सबक व्यक्ति की अस्तित्व की समझ को लगातार आकार देते रहते हैं।
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1
जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार
सहरा मगर ब-तंगी-ए-चश्म-ए-हसूद था
क़ैस के सिवा कोई और सामने नहीं आया। शायद रेगिस्तान ईर्ष्यालु आँख की तंगी के कारण सीमित था।
2
आशुफ़्तगी ने नक़्श-ए-सुवैदा किया दुरुस्त
ज़ाहिर हुआ कि दाग़ का सरमाया दूद था
मेरी बेचैनी ने हृदय के काले निशान को सही आकार दिया। तब यह स्पष्ट हुआ कि उस दाग़ का मूल कारण केवल धुआँ था।
3
था ख़्वाब में ख़याल को तुझ से मुआ'मला
जब आँख खुल गई न ज़ियाँ था न सूद था
सपने में मेरे विचारों का तुमसे संबंध था। जब मेरी आँख खुली, तो न कोई हानि थी और न कोई लाभ।
4
लेता हूँ मकतब-ए-ग़म-ए-दिल में सबक़ हनूज़
लेकिन यही कि रफ़्त गया और बूद था
मैं दिल के ग़म के मदरसे में अब भी सबक लेता हूँ, लेकिन बस यही कि जो चला गया वो चला गया और जो था वो अब नहीं रहा।
5
ढाँपा कफ़न ने दाग़-ए-उयूब-ए-बरहनगी
मैं वर्ना हर लिबास में नंग-ए-वजूद था
कफ़न ने मेरी नग्नता के दोषों के दागों को ढँक दिया है। अन्यथा, मैं हर वस्त्र में अस्तित्व के लिए एक अपमान था।
6
तेशे बग़ैर मर न सका कोहकन 'असद'
सरगश्ता-ए-ख़ुमार-ए-रुसूम-ओ-क़ुयूद था
कोहकन (फरहाद) अपने फावड़े के बिना मर न सका, 'असद', क्योंकि वह रस्मों और बंधनों के खुमार में डूबा हुआ था। वह रिवाजों से इतना बँधा था कि मरने के लिए भी उसे अपने आदी उपकरण की आवश्यकता थी।
7
आलम जहाँ ब-अर्ज़-ए-बिसात-ए-वजूद था
जूँ सुब्ह चाक-ए-जेब मुझे तार-ओ-पूद था
जब दुनिया अस्तित्व की एक विशाल बिसात के रूप में फैली हुई थी, तब मैं, भोर की तरह, एक फटा हुआ दामन था, और मेरे फटे हुए होने की यही स्थिति मेरे अस्तित्व की मूल बनावट थी।
8
बाज़ी-ख़ुर-ए-फ़रेब है अहल-ए-नज़र का ज़ौक़
हंगामा गर्म-ए-हैरत-ए-बूद-ओ-नबूद था
समझदार लोगों का शौक धोखे के खेल का शिकार है। अस्तित्व और अनस्तित्व की हैरत का एक हंगामा गर्म था।
9
आलम तिलिस्म-ए-शहर-ए-ख़मोशी है सर-बसर
या मैं ग़रीब-ए-किश्वर-ए-गुफ़्त-ओ-शुनूद था
यह दुनिया पूरी तरह से खामोशी का जादुई शहर है, या शायद मैं ही बोलने और सुनने की भूमि में एक अजनबी था।
10
तंगी रफ़ीक़-ए-रह थी अदम या वजूद था
मेरा सफ़र ब-ताला-ए-चश्म-ए-हसूद था
मेरा रास्ता हमेशा कठिनाइयों से भरा रहा, चाहे मैं अस्तित्व में था या नहीं। मेरा सफ़र किसी ईर्ष्यालु आँख की तक़दीर के अधीन था।
11
तू यक-जहाँ क़माश-ए-हवस जम्अ' कर कि मैं
हैरत-मता-ए-आलम-ए-नुक़्सान-ओ-सूद था
तुम दुनिया भर की इच्छाओं और वस्तुओं को इकट्ठा करो, क्योंकि मैं तो लाभ-हानि के संसार में आश्चर्य की दौलत था।
12
गर्दिश-मुहीत-ए-ज़ुल्म रहा जिस क़दर फ़लक
मैं पाएमाल-ए-ग़म्ज़ा-ए-चश्म-ए-कबूद था
आकाश का क्रूर चक्र जितना भी चला, मैं नीली आँखों की अदाओं से कुचला हुआ था।
13
पूछा था गरचे यार ने अहवाल-ए-दिल मगर
किस को दिमाग़-ए-मिन्नत-ए-गुफ़्त-ओ-शुनूद था
भले ही प्रिय ने मेरे दिल का हाल पूछा था, पर बातचीत करने और सुनने की ज़हमत उठाने का किसे दिमाग़ था।
14
ख़ुर शबनम-आश्ना न हुआ वर्ना मैं 'असद'
सर-ता-क़दम गुज़ारिश-ए-ज़ौक़-ए-सुजूद था
सूर्य शबनम से परिचित नहीं हुआ, अन्यथा मैं, असद, सर से पाँव तक सजदे के आनंद की विनती था।
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