ग़ज़ल
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
ہزاروں خواہشیں ایسی کہ ہر خواہش پہ دم نکلے
यह ग़ज़ल मानवीय इच्छाओं की असीमता और उनके अक्सर अधूरे रह जाने के गहन अनुभव को दर्शाती है, जहाँ हर ख्वाहिश इतनी प्रबल होती है कि जान ले लेती है। यह जीवन के अंतर्निहित दुखों और अनगिनत आकांक्षाओं के पीछे भागने की व्यर्थता के प्रति गहरी स्वीकारोक्ति को व्यक्त करती है, भले ही उनमें से कई पूरी भी हो जाएँ। कवि निरंतर दिल टूटने और आँसुओं से भरे जीवन पर चिंतन करता है, जहाँ भावनात्मक 'खून' लगातार बहता रहता है।
Source: rekhta · HI
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1
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
हज़ारों ऐसी इच्छाएँ हैं कि हर एक इच्छा पर जान निकल जाए। मेरे बहुत से अरमान पूरे हुए, लेकिन फिर भी वे कम ही महसूस हुए।
2
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
मेरा क़ातिल क्यों डरे, उसकी गर्दन पर वो खून कैसे रहेगा जो मेरी नम आँखों से सारी उम्र यूँ लगातार बहता रहता है?
3
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले
हम आदम के स्वर्ग से निकाले जाने की बात सुनते आए हैं, लेकिन हम तो तेरे कूचे से बहुत बेइज्ज़त होकर निकले हैं।
4
भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले
हे ज़ालिम, तुम्हारे क़ामत की ऊँचाई का भरम खुल जाएगा, अगर तुम्हारे घुँघराले बालों की इस लट का पेच-ओ-ख़म निकल जाए।
5
मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए
हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले
अगर कोई उसे ख़त लिखवाना चाहे तो वह हमसे लिखवाए। सुबह हो गई और मैं कान पर कलम रखकर घर से निकला।
6
हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बादा-आशामी
फिर आया वो ज़माना जो जहाँ में जाम-ए-जम निकले
इस दौर में मुझसे शराबनोशी को जोड़ा गया। फिर वह ज़माना आया जब दुनिया में जाम-ए-जम पाया गया।
7
हुई जिन से तवक़्क़ो' ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले
जिन लोगों से हमें अपनी पीड़ा का न्याय मिलने की उम्मीद थी, वे हमसे भी ज़्यादा ज़ुल्म की तलवार से घायल निकले।
8
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
मोहब्बत में जीने और मरने में कोई अंतर नहीं है। हम उसी काफ़िर को देखकर जीते हैं जिस पर हमारा दम निकलता है।
9
कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइ'ज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले
ऐ ग़ालिब, मय-ख़ाने का दरवाज़ा कहाँ और वाइ'ज़ कहाँ। पर इतना हम जानते हैं कि कल जब हम निकले तो वह जा रहा था।
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