ग़ज़ल

आमद-ए-सैलाब-ए-तूफ़ान-ए-सदा-ए-आब है

آمدِ سیلابِ طوفانِ صدائے آب ہے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 6 shers· radif: से

यह ग़ज़ल सैलाब और तूफ़ान के भयावह और सशक्त आगमन से आरंभ होती है, जो एक विशाल शक्ति का आभास कराता है। यह फिर मदहोश कर देने वाली सुंदरता के गहरे प्रभाव को दर्शाती है, जहाँ एक महफ़िल किसी की नशीली निगाहों से वहशत-कदा बन जाती है। ग़ज़ल का समापन उस अलौकिक दृश्य से होता है जहाँ शराब में परी की धड़कन छिपी हुई है, जो प्रेम या महबूब की उपस्थिति के गहन, छिपे हुए जादू और मादक सार को समेटे हुए है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
आमद-ए-सैलाब-ए-तूफ़ान-ए-सदा-ए-आब है नक़्श-ए-पा जो कान में रखता है उँगली जादा से
यह पानी की आवाज़ के तूफानी सैलाब का आगमन है; पैरों के निशान जो रास्ते से अपने कान में उँगली रखते हैं।
2
बज़्म-ए-मय वहशत-कदा है किस की चश्म-ए-मस्त का शीशे में नब्ज़-ए-परी पिन्हाँ है मौज-ए-बादा से
शराब की महफिल किसकी मदहोश आँख का वहशत-कदा (भयभीत करने वाला स्थान) है? शराब की लहरों से शीशे में एक परी की नब्ज़ (धड़कन) छिपी हुई है।
3
देखता हूँ वहशत-ए-शौक़-ए-ख़रोश-आमादा से फ़ाल-ए-रुस्वाई सरिश्क-ए-सर-ब-सहरा-दादा से
मैं उस जुनून की वहशत देखता हूँ जो शोर मचाने को तैयार है, और रुस्वाई का शगुन उन आँसुओं से देखता हूँ जो रेगिस्तान में बहा दिए गए हैं।
4
दाम गर सब्ज़े में पिन्हाँ कीजिए ताऊस हो जोश-ए-नैरंग-ए-बहार अर्ज़-ए-सहरा-दादा से
अगर आप दाम (धन/मूल्य) को हरियाली में छिपाते हैं, तो वह मोर बन जाता है, वसंत के जादू का जोश रेगिस्तान द्वारा दी गई विशालता से आता है।
5
ख़ेमा-ए-लैला सियाह ओ ख़ाना-ए-मजनूँ ख़राब जोश-ए-वीरानी है इश्क़-ए-दाग़-ए-बैरूं-दादा से
लैला का खेमा काला है और मजनूँ का घर बर्बाद है। वीरानी का यह जोश बाहर से दिए गए इश्क़ के दाग़ से है।
6
बज़्म-ए-हस्ती वो तमाशा है कि जिस को हम 'असद' देखते हैं चश्म-ए-अज़-ख़्वाब-ए-अदम-नकुशादा से
जीवन की यह महफिल एक ऐसा तमाशा है जिसे हम 'असद', अदम (शून्य) की नींद से न खुली हुई आँखों से देखते हैं।
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