“This world's grand stage, 'Asad', a show we see,With eyes still sealed from non-existence's sleep.”
जीवन की यह महफिल एक ऐसा तमाशा है जिसे हम 'असद', अदम (शून्य) की नींद से न खुली हुई आँखों से देखते हैं।
बज़्म-ए-हस्ती वो तमाशा है कि जिस को हम 'असद', देखते हैं चश्म-ए-अज़-ख़्वाब-ए-अदम-नकुशादा से। Bazm-e-hasti vo tamasha hai ki jis ko ham Asad, dekhte hain chashm-e-az-khvab-e-adam-vakushaada se. ज़िंदगी की ये महफ़िल एक तमाशा है जिसे हम उन आँखों से देख रहे हैं जो अब तक ग़ैर-मौजूदगी की नींद से पूरी तरह खुली नहीं हैं। बज़्म-ए-हस्ती का मतलब है ज़िंदगी की महफ़िल, चश्म का अर्थ है आँख, ख़्वाब-ए-अदम यानी वो गहरी नींद जो वजूद से पहले थी, और नकुशादा का मतलब है जो अभी खुली न हो। [उहम] [मृदु विराम] दोस्त, ग़ालिब यहाँ हमें एक बहुत ही मासूम मगर गहरी बात बता रहे हैं। वो कहते हैं कि हम इस दुनिया की हलचल और चमक-धमक को देख तो रहे हैं, पर हमारी आँखें अभी भी उस भारी नींद के असर में हैं जहाँ से हम आए हैं। [मृदु विराम] इसे ऐसे समझिए कि आप सो रहे थे और किसी ने अचानक आपको एक मेले के बीच खड़ा कर दिया। आप रंग देख रहे हैं, शोर सुन रहे हैं, पर आपका मन अभी भी उसी गहरी नींद में डूबा हुआ है। [आह] हम सब इस ज़िंदगी में ऐसे ही हैं, आधे जागे हुए और आधे सोए हुए। हम चीज़ों को देखते हैं पर उन्हें असल में समझ नहीं पाते क्योंकि हमारी रूह अभी भी उस पुरानी शांति और नींद को याद कर रही है। ये वैसा ही है जैसे सुबह-सुबह अलार्म बजने के बाद आप उठ तो जाते हैं पर आपका दिमाग अभी भी आपके सपनों की गलियों में भटक रहा होता है। एक मशहूर कहावत है कि दुनिया एक ख़्वाब है और मौत ही असली जागृति है। हम सब यहाँ तो हैं, पर हमारा आधा दिल अभी भी उस नींद में है जो हमने पैदा होने से पहले सोई थी।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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