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ग़ज़ल

आबरू क्या ख़ाक उस गुल की कि गुलशन में नहीं

آبرو کیا خاک اس گل کی کہ گلشن میں نہیں
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 11 shers· radif: नहीं

यह ग़ज़ल हानि, निरर्थकता और गहन निराशा के विषयों को मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है। इसमें उन चीज़ों के मूल सार और सम्मान पर प्रश्न उठाया गया है जो अपने स्रोत या संदर्भ से कटी हुई हैं, जैसे कि बगीचे के बिना फूल या दामन के बिना गरेबाँ। शेर वक्ता की अत्यधिक शारीरिक और भावनात्मक थकावट को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं, जहाँ निरंतर रोने से सारी जीवन-शक्ति क्षीण हो गई है और जीवन का सार रंग की तरह उड़ गया है, केवल शून्यता बची है।

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1
आबरू क्या ख़ाक उस गुल की कि गुलशन में नहीं है गरेबाँ नंग-ए-पैराहन जो दामन में नहीं
उस फूल की क्या आबरू, जो गुलशन में नहीं? गरेबाँ पोशाक के लिए शर्मिंदगी है यदि वह दामन से जुड़ा हुआ न हो।
2
ज़ोफ़ से ऐ गिर्या कुछ बाक़ी मिरे तन में नहीं रंग हो कर उड़ गया जो ख़ूँ कि दामन में नहीं
ऐ आँसुओ, कमज़ोरी के कारण मेरे शरीर में कुछ भी शेष नहीं बचा है। वह ख़ून जो दामन में नहीं था (जो बहकर दामन तक न पहुँचा), रंग (पीलापन) बनकर उड़ गया है।
3
हो गए हैं जमा अजज़ा-ए-निगाह-ए-आफ़ताब ज़र्रे उस के घर की दीवारों के रौज़न में नहीं
सूरज की निगाह के कण (सूरज की किरणों में धूल के ज़र्दे) जमा हो गए हैं। फिर भी, उनके घर की दीवारों के रौज़नों में एक भी ज़र्दा नहीं है।
4
रौनक़-ए-हस्ती है इश्क़-ए-ख़ाना वीराँ साज़ से अंजुमन बे-शमा है गर बर्क़ ख़िर्मन में नहीं
जीवन की चमक उस इश्क़ से है जो घर को उजाड़ दे। महफ़िल बे-शमा है अगर बिजली ख़िर्मन में नहीं, जिसका अर्थ है कि चमक के लिए ज़रूरी है कि विनाश हो।
5
ज़ख़्म सिलवाने से मुझ पर चारा-जुई का है तान ग़ैर समझा है कि लज़्ज़त ज़ख़्म-ए-सोज़न में नहीं
ज़ख़्म सिलवाने पर मुझ पर उपचार खोजने का ताना मारा जाता है। ग़ैर ने समझा है कि सुई के ज़ख़्म (टाँके लगाने के दर्द) में कोई लज़्ज़त नहीं है।
6
बस-कि हैं हम इक बहार-ए-नाज़ के मारे हुए जल्वा-ए-गुल के सिवा गर्द अपने मदफ़न में नहीं
क्योंकि हम एक नाज़ की बहार के मारे हुए हैं, हमारी कब्र में फूल के दर्शन के सिवा कोई धूल नहीं है। हमारा मदफ़न भी सौंदर्य से भरा है।
7
क़तरा क़तरा इक हयूला है नए नासूर का ख़ूँ भी ज़ौक़-ए-दर्द से फ़ारिग़ मिरे तन में नहीं
बूंद-बूंद एक नए नासूर का खाका है। मेरे तन में रक्त भी दर्द के स्वाद से मुक्त नहीं है।
8
ले गई साक़ी की नख़वत क़ुल्ज़ुम-आशामी मिरी मौज-ए-मय की आज रग मीना की गर्दन में नहीं
मेरी सागर-सी पीने की क्षमता ने साक़ी का घमंड चूर कर दिया है; आज शराब की लहर शीशे की गर्दन की रगों में भी नहीं है, यानी सारी बोतलें बिल्कुल खाली हैं।
9
हो फ़िशार-ए-ज़ोफ़ में क्या ना-तवानी की नुमूद क़द के झुकने की भी गुंजाइश मिरे तन में नहीं
कमज़ोरी के दबाव में लाचारी का क्या इज़हार होगा? मेरे शरीर में मेरे क़द के झुकने तक की भी गुंजाइश नहीं बची है।
10
थी वतन में शान क्या 'ग़ालिब' कि हो ग़ुर्बत में क़द्र बे-तकल्लुफ़ हूँ वो मुश्त-ए-ख़स कि गुलख़न में नहीं
वतन में 'ग़ालिब' मेरी क्या शान थी कि परदेस में मुझे इज़्ज़त मिले? मैं तो बेझिझक वो मुट्ठी भर तिनका हूँ जो भट्टी में जलाने के भी काम का नहीं।
11
क्या कहूँ तारीकी-ए-ज़िन्दान-ए-ग़म अंधेर है पुम्बा नूर-व-सुब्ह से कम जिस के रौज़न में नहीं
ग़म के कारागार की तारीकी क्या कहूँ, घोर अंधेर है। जिसके झरोखे में रखा रुई का टुकड़ा भी रोशनी और सुबह से कम नहीं लगता।
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